लेख – अलंकार – भाग 2

कविता में भाषा की सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है। वस्तु या व्यापार की भावना चटकीली करने और भाव को अधिक उत्कर्ष पर पहुँचाने के लिए कभी किसी वस्तु

कहानी – बासी भात में खुदा का साझा – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा, कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है, तो गौरी खिल उठी। देवताओं में उसकी आस्था

लेख – चमत्कारवाद – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

काव्य के संबंध में ‘चमत्कार’, ‘अनूठापन’ आदि शब्द बहुत दिनों से लाए जाते हैं। चमत्कार मनोरंजन की सामग्री है, इसमें संदेह नहीं। इससे जो लोग मनोरंजन को ही काव्य का

कहानी – कानूनी कुमार – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मि. कानूनी कुमार, एम.एल.ए. अपने आँफिस में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और रिपोर्टों का एक ढेर लिए बैठे हैं। देश की चिन्ताओं से उनकी देह स्थूल हो गयी है; सदैव देशोद्धार की

कविता -आखिरी कलाम – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

पहिले नावँ दैउ करलीन्हा । जेंइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा॥ दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा॥   दीन्हेसि नयन जोति, उजियारा । दीन्हेसि देखै

कहानी – शूद्र – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मां और बेटी एक झोंपड़ी में गांव के उसे सिरे पर रहती थीं। बेटी बाग से पत्तियां बटोर लाती, मां भाड़-झोंकती। यही उनकी जीविका थी। सेर-दो सेर अनाज मिल जाता

लेख – अलंकार – का भाग 3

कविता पर अत्याचार भी बहुत कुछ हुआ है। लोभियों, स्वार्थियों और खुशामदियों ने उसका गला दबाकर कहीं अपात्रों की-आसमान पर चढ़ानेवाली-स्तुति कराई है, कहीं द्रव्य न देनेवालों की निराधार निंदा।

कहानी – डामुल का कैदी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

दस बजे रात का समय, एक विशाल भवन में एक सजा हुआ कमरा, बिजली की अँगीठी, बिजली का प्रकाश। बड़ा दिन आ गया है। सेठ खूबचन्दजी अफसरों को डालियाँ भेजने

कविता – जन्म खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

चंपावति जो रूप सँवारी । पदमावति चाहै औतारी॥ भै चाहै असि कथा सलोनी । मेटि न जाइ लिखी जस होनी॥   सिंघलदीप भए तब नाऊँ । जो अस दिया बरा

कविता – सुआ खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

पदमावति तहँ खेल दुलारी । सुआ मँदिर महँ देखि मजारी॥ कहेसि चलौं जौलहि तन पाँखा । जिउ लै उड़ा ताकि बनडाँखा॥   जाइ परा बा खंड जिउ लीन्हें । मिले

कविता – सिंहलद्वीप वर्णन खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

सिंघलद्वीप कथा अब गावौं। औ सो पदमिनि बरनि सुनावौं॥ निरमल दरपन भाँति बिसेखा। जो जेहि रूप सो तैसइ देखा॥   धानि सो दीप जहँ दीपक बारी। औ पदमिनि जो दई