कहानी – नया विवाह – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

हमारी देह पुरानी है, लेकिन इसमें सदैव नया रक्त दौड़ता रहता है। नये रक्त के प्रवाह पर ही हमारे जीवन का आधार है। पृथ्वी की इस चिरन्तन व्यवस्था में यह

कविता – स्तुतिखंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

सुमिरौं आदि एक करतारू । जेहि जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू॥ कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू । कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू॥   कीन्हेसि अगिनि, पवन, जल खेहा । कीन्हेसि बहुतै रंग उरेहा॥

कहानी – बालक – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

गंगू को लोग ब्राह्मण कहते हैं और वह अपने को ब्राह्मण समझता भी है। मेरे सईस और खिदमतगार मुझे दूर से सलाम करते हैं। गंगू मुझे कभी सलाम नहीं करता।

कविता – मानसरोदक खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

एक दिवस पून्यो तिथि आई । मानसरोदक चली नहाई॥ पदमावति सब सखी बुलाई । जनु फुलवारि सबै चलि आई॥   कोइ चंपा कोइ कुंद सहेली । कोइ सु केत, करना,

कविता – राजा-सुआ संवाद खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

राजै कहा सत्य कहु सूआ । बिनु सत जस सेंवर कर भूआ॥ होइ मुख रात सत्य के बाता । जहाँ सत्य तहँ धारम सँघाता॥   बाँधाो सिहिटि अहै सत केरी

कहानी – विश्‍वास – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उन दिनों मिस जोशी बम्बई सभ्य-समाज की राधिका थी। थी तो वह एक छोटी-सी कन्या-पाठशाला की अध्यापिका पर उसका ठाट-बाट, मान-सम्मान बड़ी-बड़ी धन-रानियों को भी लज्जित करता था। वह एक

कविता – रत्नसेन जन्म खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

चित्रासेन चितउर गढ़ राजा । कै गढ़ कोट चित्रा सम साजा॥ तेहि कुल रतनसेन उजियारा । धानि जननी जनमा अस बारा॥   पंडित गुनि सामुद्रिक देखा । देखि रूप औ

रत्नसेन जन्म खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी की कविता

चितउरगढ़ कर एक बनिजारा । सिंघलदीप चला बैपारा॥ बाम्हन हुत एक निपट भिखारी । सो पुनि चला चलत बैपारी॥   ऋन काहू सन लीन्हेसि काढ़ी । मकु तहँ गए होइ

कहानी – मिस पद्मा – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

कानून में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेने के बाद मिस पद्मा को एक नया अनुभव हुआ, वह था जीवन का सूनापन। विवाह को उसने एक अप्राकृतिक बंधन समझा था और

कविता – नागमती सुआ संवाद खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

दिन दस पाँच तहाँ जो भए । राजा कतहुँ अहेरै गए॥ नागमती रुपवंती रानी । सब रनिवास पाट परधाानी॥   कै सिँगार कर दरपन लीन्हा । दरसन देखि गरब जिउ

कहानी – विद्रोही – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

आज दस साल से जब्त कर रहा हूँ। अपने इस नन्हे-से ह्रदय में अग्नि का दहकता हुआ कुण्ड छिपाये बैठा हूँ। संसार में कहीं शान्ति होगी, कहीं सैर-तमाशे होंगे, कहीं

कहानी – एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना – (लेखिका – अमृता प्रीतम)

पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी “पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों

कहानी – मनोवृत्ति – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

एक सुंदर युवती, प्रात:काल, गाँधी-पार्क में बिल्लौर के बेंच पर गहरी नींद में सोयी पायी जाय, यह चौंका देनेवाली बात है। सुंदरियाँ पार्कों में हवा खाने आती हैं, हँसती हैं,

उपन्यास – आँख की किरकिरी – भाग-1 (लेखक – रवींद्रनाथ टैगोर)

विनोद की माँ हरिमती महेंद्र की माँ राजलक्ष्मी के पास जा कर धरना देने लगी। दोनों एक ही गाँव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं। राजलक्ष्मी महेंद्र के पीछे