कविता – वैदेही-वनवास – मंगल यात्रा मत्तसमक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध पुरी आज सज्जिता है। बनी हुई दिव्य-सुन्दरी है॥ विहँस रही है विकास पाकर। अटा अटा में छटा भरी है॥1॥ दमक रहा है नगर, नागरिक। प्रवाह में मोद के बहे हैं॥ गली-गली है गयी सँवारी। चमक रहे चारु चौरहे हैं॥2॥ …

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कविता – वैदेही-वनवास – कातरोक्ति पादाकुलक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रवहमान प्रात:-समीर था। उसकी गति में थी मंथरता॥ रजनी-मणिमाला थी टूटी। पर प्राची थी प्रभा-विरहिता॥1॥ छोटे-छोटे घन के टुकड़े। घूम रहे थे नभ-मण्डल में॥ मलिना-छाया पतित हुई थी। प्राय: जल के अन्तस्तल में॥2॥ कुछ कालोपरान्त कुछ लाली। काले घन-खण्डों ने …

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कविता – वैदेही-वनवास – सती सीता ताटंक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रकृति-सुन्दरी विहँस रही थी चन्द्रानन था दमक रहा। परम-दिव्य बन कान्त-अंक में तारक-चय था चमक रहा॥ पहन श्वेत-साटिका सिता की वह लसिता दिखलाती थी। ले ले सुधा-सुधा-कर-कर से वसुधा पर बरसाती थी॥1॥ नील-नभो मण्डल बन-बन कर विविध-अलौकिक-दृश्य निलय। करता था …

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कविता – वैदेही-वनवास – वसिष्ठाश्रम तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवधपुरी के निकट मनोरम-भूमि में। एक दिव्य-तम-आश्रम था शुचिता-सदन॥ बड़ी अलौकिक-शान्ति वहाँ थी राजती। दिखलाता था विपुल-विकच भव का वदन॥1॥ प्रकृति वहाँ थी रुचिर दिखाती सर्वदा। शीतल-मंद-समीर सतत हो सौरभित॥ बहता था बहु-ललित दिशाओं को बना। पावन-सात्तिवक-सुखद-भाव से हो भरित॥2॥ …

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कविता – वैदेही-वनवास – मन्त्रणा गृह चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मन्त्रणा गृह में प्रात:काल। भरत लक्ष्मण रिपुसूदन संग॥ राम बैठे थे चिन्ता-मग्न। छिड़ा था जनकात्मजा प्रसंग॥1॥ कथन दुर्मुख का आद्योपान्त। राम ने सुना, कही यह बात॥ अमूलक जन-रव होवे किन्तु। कीर्ति पर करता है पविपात॥2॥ हुआ है जो उपकृत वह …

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कविता – वैदेही-वनवास – चिन्तित चित्त चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध के राज मन्दिरों मध्य। एक आलय था बहु-छबि-धाम॥ खिंचे थे जिसमें ऐसे चित्र। जो कहाते थे लोक-ललाम॥1॥ दिव्य-तम कारु-कार्य अवलोक। अलौकिक होता था आनन्द॥ रत्नमय पच्चीकारी देख। दिव विभा पड़ जाती थी मन्द॥2॥ कला कृति इतनी थी कमनीय। दिखाते …

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कविता – वैदेही-वनवास – उपवन रोला (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

लोक-रंजिनी उषा-सुन्दरी रंजन-रत थी। नभ-तल था अनुराग-रँगा आभा-निर्गत थी॥ धीरे-धीरे तिरोभूत तामस होता था। ज्योति-बीज प्राची-प्रदेश में दिव बोता था॥1॥ किरणों का आगमन देख ऊषा मुसकाई। मिले साटिका-लैस-टँकी लसिता बन पाई॥ अरुण-अंक से छटा छलक क्षिति-तल पर छाई। भृंग गान …

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लेख – करुणरस (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

करुणरस द्रवीभूत हृदय का वह सरस-प्रवाह है, जिससे सहृदयता क्यारी सिंचित, मानवता फुलवारी विकसित और लोकहित का हरा-भरा उद्यान सुसज्जित होता है। उसमें दयालुता प्रतिफलित दृष्टिगत होती है, और भावुकता-विभूति-भरित। इसीलिए भावुक-प्रवर-भवभूति की भावमयी लेखनी यह लिख जाती है- एको …

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कविताएँ – कविता संग्रह (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

फूल और काँटा फूल और काँटा हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता । मेह उन पर है बरसता एक सा, …

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आत्मकथा – घबराहट (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जब किसी बीमार के जी में यह बात बैठ जाती है कि अब बचना कठिन है, तो उसमें घबराहट का पैदा हो जाना कुछ आश्चर्य नहीं। अपने दुख को देखकर मैं भी बहुत घबराया, सोचने लगा, मृत्यु भी कैसी बुरी …

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आत्मकथा – जी का लोभ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जिन दिनों माघ के महीने में मेरा स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था, उन्हीं दिनों की बात है, कि एक दिन दो घड़ी रात रहे मेरी नींद अचानक टूट गयी। इस घड़ी रोग का पारा पूरी डिगरी पर था। सर घूमता …

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आत्मकथा – रोग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

हम कौन हैं, आप यह जानकर क्या करेंगे। फिर हम आप से छिप कब सकते हैं, आपकी हमारी जान-पहचान बहुत दिनों की है। हमने कई बार आप से मीठी-मीठी बातें की हैं, आपका जी बहलाया है, आपके सामने बहुत से …

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आत्मकथा – रोग का रंग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बाबू बंकिमचन्द्र चटर्जी बंगाल के एक बड़े प्रसिद्ध उपन्यास लेखक हैं। उन्होंने बंगला में ‘विष वृक्ष’ नाम का एक बड़ा ही अनूठा उपन्यास लिखा है। उसमें कालिदास की एक बड़ी मनोमोहक कहानी है-आप लोग भी उसको सुनिए। कालिदास के पास …

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पत्र – पगली का पत्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तुम कहोगे कि छि:, इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है, आकुलता भरे प्राणों का आह्वान है, संसार-वंचिता की करुण कथा …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 11 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दशमांक श्रीरुक्मिणीपरिणयनाटक का एक अतिरिक्त अंक (स्थान-शय्याभवन) (भगवान श्रीकृष्ण एक सुकोमल तल्प पर बिराजमान, व्यजनहस्ता रुक्मिणी समीप दण्डायमान) (सुलोचना व सुनैना दो परिचारिकाओं का प्रवेश) सुलो.- सखी सुनयने! आज कैसा आनन्द का दिन है, समस्त द्वारिकानिवासियों का हृदय आज कैसा …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 10 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

नवमांक ( स्थान-रणभूमि का बहि:प्रान्त) ( भगवान श्रीकृष्ण , सारथी एवं महारानी रुक्मिणी सहित एक रथ विराजमान) श्रीकृ.- (नेपथ्य की ओर देखकर) सारथी! देखो, पद्म व्यूह रचकर खड़ी यादवों की सेना को बली शाल्वादि महारथियों को आगे किए हुए शंखध्वनि …

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