नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 9 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अष्टमांक ( स्थान-जनवासे का बाहरी प्रान्त) ( बहुत से सूरमे खड़े और शिशुपाल , शाल्व , दन्तवक्र , जरासन्ध इत्यादि बहुत से वीर बैठे हैं) (एक दूत का प्रवेश) दू.- (हाथ जोड़कर काँपते हुए) महाराज! बड़ा अनर्थ हुआ। भगवान श्रीकृष्ण …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 8 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

सप्तमांक ( स्थान-देवी के मन्दिर का निकटवर्ती उद्यान) ( महारानी रुक्मिणी अपनी अनामा और अनाभिधाना प्रभृति सखियों के साथ राक्षसों की कोट में मत्तगजगति से मन्द-मन्द जा रही हैं ) अनामा- सखी अनाभिधाने! देख! राजनन्दिनी की इस समय प्रेम की …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 7 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

षष्ठांक ( जनवासे का एक विस्तृत भवन) ( शिशुपाल , जरासन्ध , शाल्व , विदूरथ , रुक्म , दन्तवक्र प्रभृति अनेक सूरमे यथास्थान बैठे हैं) शि.- (भय से) मैंने सुना है, आज बहुत सी सेना लेकर बलराम श्रीकृष्ण यहाँ आया …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 6 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पंचमांक ( स्थान-राजभवन) ( महारानी रुक्मिणी शोकाकुल एक सिंहासन पर बैठी हैं और अनामा , अनाभिधाना पास खड़ी हैं) अनामा- राजकन्यके! आज विवाह का पहिला दिन है, नगर निवासियों का हृदय प्रफुल्ल शतदल समान सुविकसित है। पर हाय! तुमारी यह …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 5 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

चतुर्थांक ( स्थान-राजभवन। भगवान श्रीकृष्ण सिंहासन पर विराजमान) ( एक ब्राह्मण का प्रवेश) ब्रा.- (आप ही आप) मेरा मन द्वारिका के बाह्योपगत भवनों की छटा देखकर इतना चमत्कृत हुआ था, कि अपने को बिल्कुल भूल गया था। किन्तु इस काल …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 4 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तृतीयांक ( स्थान-गृहान्तर्गत एक पुष्पोद्यान) ( महारानी रुक्मिणी चिन्तान्वित सिंहासन पर एक कुंज में विराजमान अनामा और अनाभिधाना दो सखियों का प्रवेश) अनामा- सखी अनाभिधाने! वसन्तागम से इस उद्यान की कैसी शोभा है, रसाल के नवदलों में उसकी नूतन मंजरियाँ …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 3 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

द्वितीयांक ( स्थान-राजसभा) ( महाराज भीष्मक , रुक्म , रुक्मकेश , मंत्री और सभासद्गण यथास्थान बैठे हैं) भीष्मक- (चिन्ता से स्वगत) ईश्वर की रचना क्या ही अपूर्व है। वह एक ही जठर है, जिससे कन्या पुत्र दोनों उत्पन्न होते हैं, …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रथमांक (स्थान-राजद्वार के सन्मुख की भूमि) (महाराणी रुक्मिणी अटा पर विराजमान) (कुछ याचकों का प्रवेश) पहला याचक- अहा! यह नगर भी कैसा रमणीय है, विशेषत: स्वर्ग में कैलाश की भाँति, अथवा सत्यलोक में बैकुण्ठ समान इस नगर में यह राजद्वार …

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नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 1 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रार्थना प्रिय सहृदय पाठकगण! नाटकरचना विषयक मेरा यह प्रथमोन्माद है। इस नाटक के प्रथम मैंने कोई दूसरा नाटक लिपिबद्ध नहीं किया है। नाटक क्या, वास्तव बात तो यह है कि एक ‘श्रीकृष्णशतक’ नामक लघु पुस्तिका के अतिरिक्त इस नाटक के …

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नाटक – श्रीप्रद्युम्नविजय व्यायोग – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

सा.- कुमार! क्या यह सुरराज निजप्रियपुत्र को प्रवर की रक्षा का निदेश दे रहे हैं? प्रद्यु.- हाँ हाँ! ज्ञात होता है कि जब तक निकुंभ ने प्रवर पर गदा का प्रहार किया, तभी तक पूज्यपाद पिता के शरजाल वहाँ तक …

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आत्मकथा – झाड़फूँक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आजकल एक विचार फैला हुआ है-जो बात चटपट समझ में न आ जावे, या दलीलों से जो पूरी तौर पर साबित न की जा सके, या जिसका प्रभाव ठीक-ठीक हम न जान सकें, वह बात मानने योग्य नहीं होती है। …

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आत्मकथा – पूजा-पाठ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पूजा-पाठ आजकल का एक ढंग यह भी है कि पहले तो हमारे मन की जितनी बातें नहीं हैं, उनको हम मानना नहीं चाहते, और यदि किसी कारण से हमको उन्हें मानना पड़ता है, तो उनको हम उलट-पुलट कर अपने मन …

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आत्मकथा – तन्त्र यन्त्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तन्त्र यन्त्र मैं समझता हँ इस ग्रन्थ के पढ़नेवालों में कितने लोग ऐसे होंगे, जो तन्त्र का नाम पढ़ते ही मुँह बना लेंगे और ग्रन्थ को अपने हाथ से दूर फेंक दें, तो भी आश्चर्य नहीं। क्योंकि आजकल एक ऐसा …

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आत्मकथा – दान पुण्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दान पुण्य मेरा विचार है कि ”न देने से देना अच्छा है”। कोई आकर हम से कुछ माँगता है, तो हम उसको क्या देते हैं। एक दो पैसे। जो हमारे लिए कुछ नहीं है, पर उसके लिए वे एक दिन …

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आत्मकथा – मृत्यु क्या है (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु क्या है जब किसी की बीमारी बढ़ जाती है, और वह समझ लेता है कि अब बचने की आशा नहीं, तो सब ओर से हटकर उसका जी यह सोचने लगता है कि मृत्यु क्या है? मरने के पीछे क्या …

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आत्मकथा – मृत्यु का भय (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का भय मृत्यु क्या है? यह आप लोगों ने समझ लिया। जैसा हमें बतलाया गया है, उससे पाया जाता है कि मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जिससे कोई डरे। यह सच है कि मरते समय लोग घबराते …

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