कवि-श्रेष्ठ मिल्टन की उक्ति है कि शान्तिकाल की विजय युद्धकाल की विजयी से कम नहीं होती। हमारा विचार है कि शान्तिकाल की विजय अधिक स्थायी, अधिक गौरवप्रद और अधिक वास्तविक
वर्तमान युग अधिकारों का युग है। संसार के कोने-कोने से अधिकारों की ध्वनि उठ रही है। अत्याचारों से पीड़ित व्यक्तियों और समूहों से लेकर स्वतंत्र और शक्तिसंपन्न व्यक्तियों और समूहों
अनुत्तरदायी? जल्दबाज? अधीर, आदर्शवादी? लुटेरे? डाकू? हत्यारे? अरे, ओ दुनियादार, तू किस नाम से, किस गाली से विभूषित करना चाहता है? वे मस्त हैं। वे दीवाने हैं। वे इस दुनिया
वैसे तो हमारा देश-भर शिक्षा में, मनुष्य की बाहरी उन्नति के इस परमावश्यक साधन के विषय में, संसार-भर के सभ्य देशों से बहुत पिछड़ा हुआ है, परंतु देश में भी
देश से सर्वश्रेष्ठ पत्र-संपादक उठ गया! ये संपादकाचार्य थे मद्रास के मि.सुब्रह्मण्यम् अय्यर। देश-भर में उनसा चतुर, योग्य और कुशाग्र बुद्धि का कोई पत्र-संपादक नहीं था। 23 वर्ष की अवस्था
अत्यंत शोक और हृदय-वेदना के साथ हम अपने पाठकों को महात्मा गोखले के देहांत का समाचार सुनाते हैं। हमारे राष्ट्रीय विकास के इतिहास में 19 फरवरी 1915 का दिन एक
धीरे-धीरे एक-एक दीपक बुझते जा रहे हैं। इस विनाश-लीला में दुर्भाग्य ने जिस मजबूती के साथ हमारे प्रांत का पल्ला पकड़ा है, वैसी मजबती से दूसरे का नहीं। वर्ष के
अंग्रेजी साहित्य-क्षेत्र के हलधर मि. जी.के. चेस्टरटन ने एक बार कहा था कि स्वस्थ चित्त का यह चिन्ह है कि वह कभी-कभी आपकी मूर्खताओं का मजाक उड़ा सके। किसी समाज