उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 11 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

चारों ओर आग बरस रही है-लू और लपट के मारे मुँह निकालना दूभर है-सूरज बीच आकाश में खड़ा जलते अंगारे उगिल रहा है और चिलचिलाती धूप की चपेटों से पेड़

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 12 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

देवहूती और उसकी मौसी के घर के ठीक पीछे भीतों से घिरी हुई एक छोटी सी फुलवारी है। भाँत-भाँत के फूल के पौधे इसमें लगे हुए हैं, चारों ओर बड़ी-बड़ी

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 3 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आठवाँ ठाट बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पहला ठाट ललकि ललकि लोयनन तेहि, लखि लखि होहु निहाल। लाली इत उत की लहत, लहे जीव जेहि लाल। एक ग्यारह बरस की लड़की अपने घर के पास की फुलवारी

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 1 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत ही अनमना

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 26 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज दस बरस पीछे हम फिर बंसनगर में चलते हैं। पौ फट रहा है, दिशाएँ उजली हो रही हैं, और आकाश के तारे एक-एक कर के डूब रहे हैं। सूरज

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 25 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बासमती के मारे जाने पर दो चार दिन गाँव में बड़ी हलचल रही, थाने के लोगों ने आकर कितनों को पकड़ा, मारनेवाले को ढूँढ़ निकालने के लिए कोई बात उठा

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 24 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज तक मरकर कोई नहीं लौटा, पर जिसको हम मरा समझते हैं, उसका जीते जागते रहकर फिर मिल जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अवसर पर जो आनन्द होता

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 23 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

एक चूकता है-एक की बन आती है। एक मरता है-एक के भाग्य जागते हैं। एक गिरता है-एक उठता है। एक बिगड़ता है-एक बनता है। एक ओर सूरज तेज को खोकर

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 22 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दिन बीतता है, रात जाती है, सूरज निकलता है, फिर डूबता है, साथ ही हमारे जीने के दिन घटते हैं। हम लोगों से कोई पूछता है, तो हम लोग कहते

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 21 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बासमती के चले जाने पर देवहूती अपनी कोठरी में से निकली, कुछ घड़ी आँगन में टहलती रही, फिर डयोढ़ी में आयी। वहाँ पहुँच कर उसने देखा, बासमती पहरे के भीलों

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 20 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

धीरे-धीरे रात बीती, भोर हुआ, बादलों में मुँह छिपाये हुए पूर्व ओर सूरज निकला-किरण फूटी। पर न तो सूरज ने अपना मुँह किसी को दिखलाया, न किरण धरती पर आयी।

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 19 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बन में जहाँ जाकर खोर लोप होती थी, वहाँ के पेड़ बहुत घने नहीं थे। डालियों के बहुतायत से फैले रहने के कारण, देखने में पथ अपैठ जान पड़ता, पर

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 18 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

एक बहुत ही घना बन है, आकाश से बातें करनेवाले ऊँचे-ऊँचे पेड़ चारों ओर खड़े हैं-दूर तक डालियों से डालियाँ और पत्तियों से पत्तियाँ मिलती हुई चली गयी हैं। जब

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 17 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज भादों सुदी तीज है, दिन का चौथा पहर बीत रहा है, स्त्रियों के मुँह में अब तक न एक दाना अन्न गया, न एक बूँद पानी पड़ा, पर वह

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 16 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

”देखो! चाल की बात अच्छी नहीं होती।” अपनी फुलवारी में टहलते हुए कामिनीमोहन ने पास खड़ी हुई बासमती से कहा- बासमती-क्या मैंने कोई आपके साथ चाल की बात की है?