प्रिय विचारशील एवं विवेचक महाशय, ‘चार’ शब्द से आशा है कि आप भली-भाँति परिचय रखते होंगे और समाचार, दुराचार, अत्याचार, अनाचार, सदाचार, शिष्टाचार, आचार, उपचार, प्रचार, विचार, उचार, अचार इत्यादि
महाराज भोज की गणना भारतवर्षीय प्रधान दानियों में होती है। वे अपने समय के धन-कुबेर तो थे ही, दानि-शिरोमणि भी थे। यदि वे मुर्तिमन्त दान थे तो उनकी धारानगरी दानधारा-तरंगिणी
यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत के आधार से ही भगवान भूतनाथ की कल्पना हुई है। वे असंख्य ब्रह्माण्डाधिपति और समस्त सृष्टि के अधीश्वर हैं। उनके रोम-रोम में
चंदा मामा, दौड़े आओ दूध कटोरा भरकर लाओ। उसे प्यार से मुझे पिलाओ मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ। मैं तेरा मृग छौना लूँगा उसके साथ हँसूँ-खेलूँगा। उसकी उछल-कूद देखूँगा उसको
अशोक में फिर फूल आ गए है। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है। बहुत सोच समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर
परिमार्जित संस्कृत जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की
अपभ्रंश भाषाओं की उत्पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्पत्ति हुई जिसे ”साहित्यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्ट हुई” या ”बिगड़ी
आर्य लोगों की सबसे पुरानी भाषा के नमूने ऋग्वेद में हैं ऋग्वेद के मंत्रों का अधिकांश आर्यों ने अपनी रोजमर्रा की बोल-चाल की भाषा में निर्माण किया था। इसमें कोई
विषयारंभ हिंदी भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने, और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं। क्योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के
पर्व और उत्सव मनुष्य का कार्य क्षेत्रा बड़ा विस्तृत है और उसमें उसकी तन्मयता अद््््भुत है। कारण यह है कि सांसारिकता का बन्धान ऐसा है कि वह मनुष्य को अधिाकतर
विभुता-विभूति प्रेम-प्रलाप भरे हैं उसमें जितने भाव, मलिन हैं, या वे हैं अभिराम, फूल-सम हैं या कुलिश-समान, बताऊँ क्या मैं तुझको श्याम! हृदय मेरा है तेरा धााम। गए तुम मुझको