लेख – चार (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रिय विचारशील एवं विवेचक महाशय, ‘चार’ शब्द से आशा है कि आप भली-भाँति परिचय रखते होंगे और समाचार, दुराचार, अत्याचार, अनाचार, सदाचार, शिष्टाचार, आचार, उपचार, प्रचार, विचार, उचार, अचार इत्यादि

लेख – धाराधीश की दान-धारा (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

महाराज भोज की गणना भारतवर्षीय प्रधान दानियों में होती है। वे अपने समय के धन-कुबेर तो थे ही, दानि-शिरोमणि भी थे। यदि वे मुर्तिमन्त दान थे तो उनकी धारानगरी दानधारा-तरंगिणी

लेख – भगवान भूतनाथ और भारत (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत के आधार से ही भगवान भूतनाथ की कल्पना हुई है। वे असंख्य ब्रह्माण्डाधिपति और समस्त सृष्टि के अधीश्वर हैं। उनके रोम-रोम में

बाल साहित्य – चंदा मामा (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

चंदा मामा, दौड़े आओ दूध कटोरा भरकर लाओ। उसे प्यार से मुझे पिलाओ मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ। मैं तेरा मृग छौना लूँगा उसके साथ हँसूँ-खेलूँगा। उसकी उछल-कूद देखूँगा उसको

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 3 – बोलचाल विशेष वक्तव्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मनुष्य को कभी-कभी ऐसा कार्य हाथ में लेना पड़ता है, जिसमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तिा नहीं होती, अब मैं एक ऐसा ही विषय हाथ में ले रहा हूँ, जिस पर मैं

निबंध – अशोक के फूल – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

अशोक में फिर फूल आ गए है। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्‍पों के मनोहर स्‍तबकों में कैसा मोहन भाव है। बहुत सोच समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्‍पों को छोड़कर

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – उपसंहार – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आज तक‍ कुछ लोगों का ख्‍याल था कि हिंदी की जननी संस्‍कृत है। यह बात भारत की भाषाओं की खोज से गलत साबित हो गई। जो उद्गम-स्‍थान परिमार्जित संस्‍कृत का

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – आधुनिक काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

परिमार्जित संस्‍कृत जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – अपभ्रंश-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – प्राकृत-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आर्य लोगों की सबसे पुरानी भाषा के नमूने ऋग्‍वेद में हैं ऋग्‍वेद के मंत्रों का अधिकांश आर्यों ने अपनी रोजमर्रा की बोल-चाल की भाषा में निर्माण किया था। इसमें कोई

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – पूर्ववर्ती काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

विषयारंभ हिंदी भाषा की उत्‍पत्ति का पता लगाने, और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं। क्‍योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – भूमिका – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी जरूरत है, और हिंदी भाषा और

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पवित्रा पर्व – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पर्व और उत्सव मनुष्य का कार्य क्षेत्रा बड़ा विस्तृत है और उसमें उसकी तन्मयता अद््््भुत है। कारण यह है कि सांसारिकता का बन्धान ऐसा है कि वह मनुष्य को अधिाकतर

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – कल्पलता – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

विभुता-विभूति प्रेम-प्रलाप भरे हैं उसमें जितने भाव, मलिन हैं, या वे हैं अभिराम, फूल-सम हैं या कुलिश-समान, बताऊँ क्या मैं तुझको श्याम! हृदय मेरा है तेरा धााम। गए तुम मुझको

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – फूल-पत्तो- (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

भेद भरी बातें पी कहाँ चौपदे श्याम घन में है किसकी झलक। कौन रहता है रस से भरा। लुभा लेती है धारती किसे। दुपट्टा ओढ़ ओढ़ कर हरा।1। बड़ी ऍंधिायाली

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पद्य-प्रसून- पावन प्रसंग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पावन प्रसंग अभेद का भेद दोहा खोजे खोजी को मिला क्या हिन्दू क्या जैन। पत्ता पत्ता क्यों हमें पता बताता है न।1। रँगे रंग में जब रहे सकें रंग क्यों