हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पद्य-प्रमोद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)
प्रभु-प्रताप [षट्पद] चाँद औ सूरज गगन में घूमते हैं रात दिन। तेज औ तम से, दिशा होती है उजली औ मलिन। वायु बहती है, घटा उठती है, जलती है अगिन। फूल होता है अचानक वज्र से बढ़कर कठिन। जिस अलौकिक …