कहानी – सच्चाई का उपहार – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

तहसीली मदरसा बराँव के प्रथमाध्यापक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारियों में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियाँ लगा रखी थीं। दरवाजों पर लताएँ चढ़ा दी थीं। इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गई थी। वह मिडिल कक्षा …

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आत्मकथा – पं. कमलापति त्रिपाठी – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सो, तुम जीते – कमला, और बहुत ख़ूब जीते। अभी गत कल ही की तो बात है। तुम प्रादेशिक साहित्‍य-सम्‍मेलन के अध्‍यक्ष बने थे (सन् 1948-49)। उन्‍हीं दिनों लखनऊ में मैं भी मोहक मिनिस्‍टर श्री केशवदेव मालवीय का मेहमान था। …

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कहानी – देवरथ – (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

दो-तीन रेखाएँ भाल पर, काली पुतलियों के समीप मोटी और काली बरौनियों का घेरा, घनी आपस में मिली रहने वाली भवें और नासा-पुट के नीचे हलकी-हलकी हरियाली उस तापसी के गोरे मुँह पर सबल अभिव्यक्ति की प्रेरणा प्रगट करती थी। …

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आत्मकथा – बनारस और कलकत्ता – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्‍टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी रंग देखे तब दुखदायी होने पर भी चरित्रहीनता में मेरा …

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कहानी – मूठ – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य ही कहिए या व्यावसायिक सिद्धान्तों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका घर सँकरी गली में था; पर उनके जी में खुली …

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आत्मकथा – जीवन-संक्षेप – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सन् 1921 ई. में जेल से आने के बाद नितान्‍त ग़रीबी में, ग़रीब रेट पर, ‘आज’ में मैं सन् 1924 के मध्‍य तक राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के पक्ष में प्रचारात्‍मक कहानियाँ, कविताएँ, गद्य-काव्‍य, एकांकी, व्‍यंग्‍य और विनोद बराबर लिखता रहा। सन् …

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कहानी – विराम-चिह्न (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

देव-मन्दिर के सिंहद्वार से कुछ दूर हट कर वह छोटी-सी दुकान थी। सुपारी के घने कुञ्ज के नीचे एक मैले कपड़े पर सूखी हुई धार में तीन-चार केले, चार कच्चे पपीते, दो हरे नारियल और छ: अण्डे थे। मन्दिर से …

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आत्मकथा – असंबल गान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

उपदेशक— तेरी कन्‍था के कोने में कुछ संबल, या संशय है, अरे पथिक, होने में? तेरी. यदि कुछ हो न ठहरता जा ना, कन्‍था अपनी भरता जा ना, करम दिखा इन बाज़ारों में कुछ धरता कुछ हरता जा ना। करता …

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कहानी – पशु से मनुष्य – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

दुर्गा माली डॉक्टर मेहरा, बार-ऐट ला, के यहाँ नौकर था। पाँच रुपये मासिक वेतन पाता था। उसके घर में स्त्री और दो-तीन छोटे बच्चे थे। स्त्री पड़ोसियों के लिए गेहूँ पीसा करती थी। दो बच्चे, जो समझदार थे, इधर-उधर से …

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