उपन्यास – कर्मभूमि – 1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

ग्यारह सारे शहर में कल के लिए दोनों तरह की तैयारियां होने लगीं-हाय-हाय की भी और वाह-वाह की भी। काली झंडियां भी बनीं और फलों की डालियां भी जमा की

उपन्यास – कर्मभूमि – 2- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उत्तर की पर्वत-श्रेणियों के बीच एक छोटा-सा रमणीक गांव है। सामने गंगा किसी बालिका की भांति हंसती, उछलती, नाचती, गाती, दौड़ती चली जाती है। पीछे ऊंचा पहाड़ किसी वृध्द योगी

उपन्यास – कर्मभूमि – 3 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

लाला समरकान्त की जिंदगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गए। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्‍या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकांत

उपन्यास – कर्मभूमि – 4 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अमरकान्त को ज्योंही मालूम हुआ कि सलीम यहां का अफसर होकर आया है, वह उससे मिलने चला। समझा, खूब गप-शप होगी। यह खयाल तो आया, कहीं उसमें अफसरी की बू

उपन्यास – कर्मभूमि – 4 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘महन्तजी के दर्शन तुमने कभी किए हैं?’ ‘मैंने भला मैं कैसे करता- मैं कभी नहीं आया।’   नौ बज रहे थे, इस वक्त घर लौटना मुश्किल था। पहाड़ी रास्ते, जंगली

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

यह हमारा लखनऊ का सेंटल जेल शहर से बाहर खुली हुई जगह में है। सुखदा उसी जेल के जनाने वार्ड में एक वृक्ष के नीचे खड़ी बादलों की घुड़दौड़ देख

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘यह क्यों नहीं कहते तुममें गैरत नहीं है?’ ‘आप तो मुसलमान हैं। क्या आपका फर्ज नहीं है कि बादशाह की मदद करें?’   ‘अगर मुसलमान होने का यह मतलब है

उपन्यास – गबन -1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट गई। रमा ने पूछा–क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?   जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा–कुछ नहीं,

उपन्यास – गबन – 2 -2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमेश ने मुस्कराकर कहा, ‘अच्छा, यह किस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये किसलिए दिए! मैं गिन रहा था, छः नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।’ रमानाथ-‘ठग

उपन्यास – गबन – 3 -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

इक्कीस   अगर इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से निराश, चिंताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो, तो उस युवक को देखे, जो साइकिल

उपन्यास – गबन – 4 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उसी दिन शव काशी लाया गया। यहीं उसकी दाह-क्रिया हुई। वकील साहब के एक भतीजे मालवे में रहते थे। उन्हें तार देकर बुला लिया गया। दाह-क्रिया उन्होंने की। रतन को

उपन्यास – गबन – 4 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पैंतीस रूदन में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर, किसी की स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसक-सिसक और बिलखबिलख नहीं रोया, वह जीवन