कहानी – बेटी का धन- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बेतवा नदी दो ऊँचे कगारों के बीच इस तरह मुँह छिपाये हुए थी जैसे निर्मल हृदयों में साहस और उत्साह की मद्धम ज्योति छिपी रहती है। इसके एक कगार पर

कहानी – उर्वशी (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

विलसत सान्ध्य दिवाकर की किरनैं माला सी। प्रकृति गले में जो खेलति है बनमाला सी।।   तुंग लसैं गिरिशृंग भर्यो कानन तरुगन ते।   जिनके भुज मैं अरुझि पवनहू चलत

कहानी – बभ्रुवाहन (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

प्रथम परिच्छेद मणि-प्रभापूर मणिपुर नगर के प्रान्त में एक उद्यान के द्वार पर प्रतीची दिशा-नायिकानुकूल तरणि के अरुण-किरण की प्रभा पड़ रही है। वासन्तिक सान्ध्य वायु का प्रताप क्रमश: उदय

कहानी – विस्मृति – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

चित्रकूट के सन्निकट धनगढ़ नामक एक गाँव है। कुछ दिन हुए वहाँ शानसिंह और गुमानसिंह दो भाई रहते थे। ये जाति के ठाकुर (क्षत्रिय) थे। युद्धस्थल में वीरता के कारण

कहानी – दुखिया (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

पहाड़ी देहात, जंगल के किनारे के गाँव और बरसात का समय! वह भी ऊषाकाल! बड़ा ही मनोरम दृश्य था। रात की वर्षा से आम के वृक्ष तराबोर थे। अभी पत्तों

कहानी – प्रारब्ध – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

लाला जीवनदास को मृत्युशय्या पर पड़े 6 मास हो गये हैं। अवस्था दिनोंदिन शोचनीय होती जाती है। चिकित्सा पर उन्हें अब जरा भी विश्वास नहीं रहा। केवल प्रारब्ध का ही

कहानी – घीसू (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

सन्ध्या की कालिमा और निर्जनता में किसी कुएँ पर नगर के बाहर बड़ी प्यारी स्वर-लहरी गूँजने लगती। घीसू को गाने का चसका था, परन्तु जब कोई न सुने। वह अपनी

कहानी – सुहाग की साड़ी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

यह कहना भूल है कि दाम्पत्य-सुख के लिए स्त्री-पुरुष के स्वभाव में मेल होना आवश्यक है। श्रीमती गौरा और श्रीमान् कुँवर रतनसिंह में कोई बात न मिलती थी। गौरा उदार

लेख – सोयी हुई जातियाँ पहले जगेंगी – (लेखक – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)

”न निवसेत् शूद्रराज्ये” मनु का यह कहना बहुत बड़ा अर्थ-गौरव रखता है। शूद्रों के राज्य में रहने से ब्राह्मण-मेधा नष्ट हो जाती है। पर यह यवन और गौरांगों के 800

कहानी – वैर का अंत – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रामेश्वरराय अपने बड़े भाई के शव को खाट से नीचे उतारते हुए भाई से बोले-तुम्हारे पास कुछ रुपये हों तो लाओ, दाह-क्रिया की फिक्र करें, मैं बिलकुल खाली हाथ हूँ।

कहानी – छोटा जादूगर (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों

कहानी – निर्वासन – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो! मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?   परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और