व्यंग – सिद्धांतों की व्यर्थता (लेखक – हरिशंकर परसाई)

अब वे धमकी देने लगे हैं कि हम सिद्धांत और कार्यक्रम की राजनीति करेंगे। वे सभी जिनसे कहा जाता है कि सिद्धांत और कार्यक्रम बताओ। ज्योति बसु पूछते थे, नंबूदरीपाद

लोककथा – अपना-पराया (लेखक – हरिशंकर परसाई)

आप किस स्‍कूल में शिक्षक हैं?’ ‘मैं लोकहितकारी विद्यालय में हूं। क्‍यों, कुछ काम है क्‍या?’ ‘हाँ, मेरे लड़के को स्‍कूल में भरती करना है।’ ‘तो हमारे स्‍कूल में ही

लोककथा – दानी (लेखक – हरिशंकर परसाई)

बाढ़-पीड़ितों के लिए चंदा हो रहा था। कुछ जनसेवकों ने एक संगीत-समारोह का आयोजन किया, जिसमें धन एकत्र करने की योजना बनाई। वे पहुँचे एक बड़े सेठ साहब के पास।

लोककथा – रसोई घर और पाखाना (लेखक – हरिशंकर परसाई)

गरीब लड़का है। किसी तरह हाई स्‍कूल परीक्षा पास करके कॉलेज में पढ़ना चाहता है। माता-पिता नहीं हैं। ब्राह्मण है। शहर में उसी के सजातीय सज्‍जन के यहाँ उसके रहने

लोककथा – सुधार (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक जनहित की संस्‍था में कुछ सदस्‍यों ने आवाज उठाई, ‘संस्‍था का काम असंतोषजनक चल रहा है। इसमें बहुत सुधार होना चाहिए। संस्‍था बरबाद हो रही है। इसे डूबने से

पत्र – अग्रज के नाम (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

पूज्‍य भाई साहब प्रणाम। झाँसी से लिखे हुए पत्र आपको मिल गये होंगे। उसके सबेरे ही मैं यहाँ बनापुर चतुर्वेदी जी के साथ चला आया। यहाँ अच्‍छी तरह से हूँ।

पत्र – पत्‍नी के नाम (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

मेरी परम प्‍यारी प्रकाश, कल तुम्‍हारा पत्र प्राप्‍त हुआ। तुमने जो कुछ लिखा है, व‍ह बिल्‍कुल ठीक है। माफी माँगने से अच्‍छा यह है कि मौत हो जाये। तुम विश्‍वास

पत्र – माँ के नाम (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

पूज्‍यनीय माँ, चरणों में प्रणाम। मैं तुम्‍हें कुछ भी सुख न पहुँचा सका। सदा कष्‍ट देता रहा। फिर कष्‍ट दे रहा हूँ। पिता की यह दशा है तो भी मैंने

निबंध – अदालत के सामने लिखित बयान (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

सरकारी रिपोर्टर ने मेरे व्‍याख्‍यान की जो रिपोर्ट की है वह अपूर्ण, गलत और कहीं-कहीं बिल्‍कुल विकृत है। मेरा मतलब यह नहीं है कि रिपोर्टर ने जान-बूझकर महज इसलिए उसमें