जानिये ➤ प्रसिद्ध लेखकों की सामाजिक प्रेरणास्पद कहानियां, कवितायें, साहित्य, जिनका अध्ययन व प्रचार करके वापस दिलाया जा सकता है मातृभूमि भारतवर्ष की आदरणीय राष्ट्रभाषा हिन्दी के खोये हुए सम्मान को
बाबू बंकिमचन्द्र चटर्जी बंगाल के एक बड़े प्रसिद्ध उपन्यास लेखक हैं। उन्होंने बंगला में ‘विष वृक्ष’ नाम का एक बड़ा ही अनूठा उपन्यास लिखा है। उसमें कालिदास की एक बड़ी
तुम कहोगे कि छि:, इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है,
दशमांक श्रीरुक्मिणीपरिणयनाटक का एक अतिरिक्त अंक (स्थान-शय्याभवन) (भगवान श्रीकृष्ण एक सुकोमल तल्प पर बिराजमान, व्यजनहस्ता रुक्मिणी समीप दण्डायमान) (सुलोचना व सुनैना दो परिचारिकाओं का प्रवेश) सुलो.- सखी सुनयने! आज कैसा
नवमांक ( स्थान-रणभूमि का बहि:प्रान्त) ( भगवान श्रीकृष्ण , सारथी एवं महारानी रुक्मिणी सहित एक रथ विराजमान) श्रीकृ.- (नेपथ्य की ओर देखकर) सारथी! देखो, पद्म व्यूह रचकर खड़ी यादवों की
अष्टमांक ( स्थान-जनवासे का बाहरी प्रान्त) ( बहुत से सूरमे खड़े और शिशुपाल , शाल्व , दन्तवक्र , जरासन्ध इत्यादि बहुत से वीर बैठे हैं) (एक दूत का प्रवेश) दू.-
सप्तमांक ( स्थान-देवी के मन्दिर का निकटवर्ती उद्यान) ( महारानी रुक्मिणी अपनी अनामा और अनाभिधाना प्रभृति सखियों के साथ राक्षसों की कोट में मत्तगजगति से मन्द-मन्द जा रही हैं )
पंचमांक ( स्थान-राजभवन) ( महारानी रुक्मिणी शोकाकुल एक सिंहासन पर बैठी हैं और अनामा , अनाभिधाना पास खड़ी हैं) अनामा- राजकन्यके! आज विवाह का पहिला दिन है, नगर निवासियों का
चतुर्थांक ( स्थान-राजभवन। भगवान श्रीकृष्ण सिंहासन पर विराजमान) ( एक ब्राह्मण का प्रवेश) ब्रा.- (आप ही आप) मेरा मन द्वारिका के बाह्योपगत भवनों की छटा देखकर इतना चमत्कृत हुआ था,
तृतीयांक ( स्थान-गृहान्तर्गत एक पुष्पोद्यान) ( महारानी रुक्मिणी चिन्तान्वित सिंहासन पर एक कुंज में विराजमान अनामा और अनाभिधाना दो सखियों का प्रवेश) अनामा- सखी अनाभिधाने! वसन्तागम से इस उद्यान की
द्वितीयांक ( स्थान-राजसभा) ( महाराज भीष्मक , रुक्म , रुक्मकेश , मंत्री और सभासद्गण यथास्थान बैठे हैं) भीष्मक- (चिन्ता से स्वगत) ईश्वर की रचना क्या ही अपूर्व है। वह एक
प्रथमांक (स्थान-राजद्वार के सन्मुख की भूमि) (महाराणी रुक्मिणी अटा पर विराजमान) (कुछ याचकों का प्रवेश) पहला याचक- अहा! यह नगर भी कैसा रमणीय है, विशेषत: स्वर्ग में कैलाश की भाँति,
प्रार्थना प्रिय सहृदय पाठकगण! नाटकरचना विषयक मेरा यह प्रथमोन्माद है। इस नाटक के प्रथम मैंने कोई दूसरा नाटक लिपिबद्ध नहीं किया है। नाटक क्या, वास्तव बात तो यह है कि