कविता – राजा-गजपति-संवाद खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

मासेक लाग चलत तेहि वाटा । उतरे जाइ समुद के घाटा॥ रतनसेन भा जोगी जती । सुनि भेंटै आवा गजपती॥   जोगी आपु, कटक सब चेला। कौन दीप कहँ चाहहिं

कहानी – विषम समस्या – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मेरे दफ्तर में चार चपरासी थे, उनमें एक का नाम गरीब था। बहुत ही सीधा, बड़ा आज्ञाकारी, अपने काम में चौकस रहनेवाला, घुड़कियाँ खाकर चुप रह जानेवाला। यथा नाम तथा

कविता -नागमती-पदमावती-विवाद खंड, रत्नसेन-संतति खंड, राघवचेतन देशनिकाला खंड, राघवचेतन-दिल्ली-गमन खंड- मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

जाही जूही तेहि फुलवारी । देखि रहस रहि सकी न बारी॥ दूतिन्ह बात न हिये समानी । पदमावति पहँ कहा सो आनी॥   नागमती है आपनि बारी । भँवर मिला

कहानी – गुप्तधन – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बाबू हरिदास का ईंटों का पजावा शहर से मिला हुआ था। आसपास के देहातों से सैकड़ों स्त्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर पर उठा कर ऊपर कतारों

कविता – रत्नसेन साथी खंड, षट्ऋतु वर्णन खंड, नागमती-वियोग खंड,नागमती-संदेश खंड,रत्नसेन-बिदाई खंड – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

रतनसेन गए अपनी सभा । बैठे पाट जहाँ अठख्रभा॥ आइ मिले चितउर के साथी । सबै बिहँसि के दीन्ही हाथी॥   राजा कर भल मानहु भाई । जेइ हम कहँ

कहानी – अनिष्ट शंका – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

चाँदनी रात, समीर के सुखद झोंके, सुरम्य उद्यान। कुँवर अमरनाथ अपनी विस्तीर्ण छत पर लेटे हुए मनोरमा से कह रहे थे- तुम घबराओ नहीं, मैं जल्द आऊँगा। मनोरमा ने उनकी

कविता – देशयात्रा खंड, लक्ष्मी-समुद्र खंड,चित्तौर -आगमन खंड, – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

बोहित भरे, चला लेइ रानी । दान माँगि सत देखै दानी॥ लोभ न कीजै, दीजै दानू । दान पुन्नि तें होइ कल्यानू॥   दरब दान देबै बिधिा कहा । दान

कविता – गंधर्वसेन मंत्री खंड, रत्नसेन सूली खंड, रत्नसेन-पद्मावती-विवाह खंड, -पदमावती-रत्नसेन-भेंट खंड पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

राजै सुनि जोगी गढ़ चढ़े । पूछै पास जो पंडित पढ़े॥ जोगी गढ़ जो सेंधिा दै आवहिं । बोलहु सबद सिध्दि जस पावहिं॥   कहहिं बेद पढ़ि पंडित बेदी ।

कहानी – आदर्श विरोध – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

महाशय दयाकृष्ण मेहता के पाँव जमीन पर न पड़ते थे। उनकी वह आकांक्षा पूरी हो गयी थी जो उनके जीवन का मधुर स्वप्न था। उन्हें वह राज्याधिकार मिल गया था

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 17 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आजाद के दिल में एक दिन समाई कि आज किसी मसजिद में नमाज पढ़े, जुमे का दिन है, जामे-मसजिद में खूब जमाव होगा। फौरन मसजिद में आ पहुँचे। क्या देखते

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 18 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

मियाँ आजाद एक दिन चले जाते थे, तो देखते क्या हैं, एक चौराहे के नुक्कड़ पर भंगवाले की दुकान है और उस पर उनके एक लँगोटिए यार बैठे डींग की

कविता -देवपाल-दूती खंड, बादशाह-दूती खंड, पद्मावती-गोरा-बादल-संवाद खंड, गोरा-बादल-युध्द-यात्राा खंड, गोरा-बादल-युध्द खंड, बंधन-मोक्ष; पद्मावती-मिलन खंड,- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

कुंभलनेर राय देवपालू । राजा केर सत्राु हिय सालू॥ वह पै सुना कि राजा बाँधाा । पाछिल बैर सँवरि छर साधाा॥   सत्राुसाल तब नेवरै सोई । जौ घर आव

कविता -राजा-बादशाह-मेल खंड, बादशाह भोज खंड, चित्तौरगढ़-वर्णन खंड, पद्मावती-नागमती-विलाप खंड, रत्नसेन-बंधन खंड- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

सुना साह अरदासैं पढ़ीं । चिंता आन आनि चित चढ़ी॥ तौ अगमन मन चीतै कोई । जौ आपन चीता किछु होई॥   मन झूठा, जिउ हाथ पराए । चिंता एक

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 19 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

एक दिन मियाँ आजाद साँड़नी पर सवार हो घूमने निकले, तो एक थिएटर में जा पहुँचे। सैलानी आदमी तो थे ही, थिएटर देखने लगे, तो वक्त का खयाल ही न