कहानी – विचित्र होली – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

होली का दिन था; मिस्टर ए.बी. क्रास शिकार खेलने गये हुए थे। साईस, अर्दली, मेहतर, भिश्ती, ग्वाला, धोबी सब होली मना रहे थे। सबों ने साहब के जाते ही खूब

कहानी – डिक्री के रुपये- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

नईम और कैलास में इतनी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक अभिन्नता थी, जितनी दो प्राणियों में हो सकती है। नईम दीर्घकाय विशाल वृक्ष था, कैलास बाग का कोमल पौधा; नईम

कहानी – चित्तौड़-उद्धार (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

दीपमालाएँ आपस में कुछ हिल-हिलकर इंगित कर रही हैं, किन्तु मौन हैं। सज्जित मन्दिर में लगे हुए चित्र एकटक एक-दूसरे को देख रहे हैं, शब्द नहीं हैं। शीतल समीर आता

कहानी – कला (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

उसके पिता ने बड़े दुलार से उसका नाम रक्खा था-‘कला’। नवीन इन्दुकला-सी वह आलोकमयी और आँखों की प्यास बुझानेवाली थी। विद्यालय में सबकी दृष्टि उस सरल-बालिका की ओर घूम जाती

कहानी – शतरंज के खिलाड़ी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, गरीब-अमीर सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो

कहानी – अशोक (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

पूत-सलिला भागीरथी के तट पर चन्द्रालोक में महाराज चक्रवर्ती अशोक टहल रहे हैं। थोड़ी दूर पर एक युवक खड़ा है। सुधाकर की किरणों के साथ नेत्र-ताराओं को मिलाकर स्थिर दृष्टि

कहानी – बाबाजी का भोग – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रामधन अहीर के द्वार पर एक साधु आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधु पर श्रद्धा कर। रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधु द्वार पर आये हैं, उन्हें

कहानी – गुलाम (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

फूल नहीं खिलते हैं, बेले की कलियाँ मुरझाई जा रही हैं। समय में नीरद ने सींचा नहीं, किसी माली की भी दृष्टि उस ओर नहीं घूमी; अकाल में बिना खिले

कहानी – भाड़े का टट्टू – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

आगरा कालेज के मैदान में संध्या-समय दो युवक हाथ से हाथ मिलाये टहल रहे थे। एक का नाम यशवंत था, दूसरे का रमेश। यशवंत डीलडौल का ऊँचा और बलिष्ठ था।

कविताएँ – आशा सर्ग – कामायनी (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

भाग-1 ऊषा सुनहले तीर बरसती   जयलक्ष्मी-सी उदित हुई,   उधर पराजित काल रात्रि भी   जल में अतंर्निहित हुई।     वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का   आज

कहानी – डिमॉन्सट्रेशन – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

महाशय गुरुप्रसादजी रसिक जीव हैं, गाने-बजाने का शौक है, खाने-खिलाने का शौक है और सैर-तमाशे का शौक है; पर उसी मात्र में द्रव्योपार्जन का शौक नहीं है। यों वह किसी

कविताएँ – इडा सर्ग – कामायनी (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

भाग-1 “किस गहन गुहा से अति अधीर   झंझा-प्रवाह-सा निकला   यह जीवन विक्षुब्ध महासमीर   ले साथ विकल परमाणु-पुंज     नभ, अनिल, अनल,   भयभीत सभी को भय

कविताएँ – श्रृद्धा सर्ग – कामायनी (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

भाग-1 कौन हो तुम? संसृति-जलनिधि   तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक,   कर रहे निर्जन का चुपचाप   प्रभा की धारा से अभिषेक?     मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का