पिता रत्नाकरो यस्य, लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शङ्खो भिक्षाटनं कुर्यात्, फलं भाग्यानुसारतः ।। मतलब – पिता जिसका सागर है, और लक्ष्मी जिसकी बहन है (यहाँ शंख की बात हो रही
वैसे तो उड़ीसा के पुरी मंदिर को कलियुग का साक्षात मोक्षदायिनी तीर्थ कहा गया है और जहा साक्षात जगन्नाथ भगवान कृष्ण विराजते हो उस स्थल पर अनगिनत दृश्य – अदृश्य
मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने भी उस रामपथ को खोजने की शुरूआत की है जो अयोध्या से चित्रकूट होता हुआ दण्डकारण क्षेत्र से पंचवटी होते हुआ रामेश्वरम जाता है !
श्री पं. रामस्वरुप जी चाचोदिया, राठ का कहना है सामान्यतया मनुष्य तत्काल के लाभ को देखता है। तात्कालिक लोभ के लिए वह भविष्य की भारी हानि का खतरा भी उठाता
श्री भूरेलाल जी वैद्य, हर्रई लिखते हैं कि पं. नर्मदाप्रसाद शास्त्री भदरस कानपुर के रहने वाले विद्यावान भाग्यवश हर्रई (जागीर) के राम मन्दिर में आकर पुजारी हो गये थे, ईश्वर
शा. मोड़कमल केजड़ीवाल, कलकत्ता लिखते हैं कि जोधपुर राज्य के एक गाँव में हमारी जन्मभूमि है। हिन्दी मिडिल पास करने के बाद पास के गाँव में प्राइमरी स्कूल का अध्यापक
श्री शंभूचरण विश्वनोई, वीरपुर लिखते हैं कि हमारे पिता जी बड़े चतुर और बुद्घिमान थे। उन्होने अपने हाथों लगभग दस लाख की सम्पत्ति कमाई थी। जमींदारी, देन-लेन, घी और गल्ले