
आप सभी आदरणीय पाठकों को प्रणाम,
संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2026 को, “अंतर्राष्ट्रीय चारागाह और पशुपालक वर्ष” (International Year of Rangelands and Pastoralists – IYRP) घोषित किया है ! इसका उद्देश्य घास के मैदानों (Rangelands) व पशुपालकों (Pastoralists) का संरक्षण व संवर्धन करना है क्योकि दुनिया की सबसे खतरनाक समस्याओं जैसे क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग आदि को रोकने में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए इनके प्रति आम जनता में भी जागरूकता बढ़ाना तुरंत जरूरी हो गया है !
वास्तव में घास के मैदान, कार्बन सोखने (carbon sink) में बहुत मदद करते हैं, और मरुस्थलीकरण (desertification) का अनावश्यक बढ़ना भी एकदम रोक देतें है जिससे जैव विविधता में भी काफी इजाफ़ा होता है ! पूरी दुनिया की लगभग आधी जमीन चारागाह ही है और लगभग 50 करोड़ लोग इन्ही चारागाहों के पशुपालन से जुड़े हुए हैं (अधिक जानकारी के लिए कृपया ये 3 यूट्यूब वीडियो देखें- https://www.youtube.com/watch?v=FnzQ4wnY2iM और https://www.youtube.com/watch?v=7zxzqVEdqF0 और https://www.youtube.com/watch?v=TMp52BoJiqQ) !
जैसे कोई मानव सिर्फ एक तरह का अनाज या सब्जी खाकर सभी तरह के पौष्टिक तत्वों (विटामिन्स, प्रोटीन, मिनरल्स आदि) को नहीं पा सकता, इसलिए उसे बेहतर स्वास्थ के लिए अलग – अलग तरह के अनाज, सब्जियां, फल, तरल आदि का भी सही मिश्रण खाते रहना पड़ता है, ठीक उसी तरह से पृथ्वी के पर्यावरण को स्वस्थ बने रहने के लिए इन 7 अलग – अलग तरह के इकोसिस्टम के सही अनुपात की जरूरत पड़ती है- 1- फॉरेस्ट (जंगल), 2- ग्रासलैंड (रेंजलैंड यानी चारागाह) , 3- डिजर्ट (रेगिस्तान), 4- टुंड्रा (बर्फीले स्थान), 5- एक्वेटिक (समुद्र जैसे जलीय तंत्र), 6- माउंटेन (पहाड़ीय क्षेत्र), 7- मडलैंड (दलदलीय क्षेत्र) !
तो यहाँ पर कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि आखिर रेगिस्तान जैसी निर्जन, बंजर जमीन से पृथ्वी के पर्यावरण का क्या भला हो सकता है ? तो इसका उत्तर नीचे दिए गए उदाहरण से समझा जा सकता है और साथ ही यह भी जाना जा सकता है कि भगवान के द्वारा बनाई गयी इस आश्चर्यजनक दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं है, बस जरूरत है हम अल्प बुद्धि वाले मानवों को उन आश्चर्यों के पीछे छिपे रहस्यों को समझ पाने की !

जैसे पहले कई लोग कहते थे कि अगर सहारा के विशाल रेगिस्तान (जो कि भारत से लगभग 3 गुना बड़ा है) को किसी तरह खेती योग्य भूमि में बदल दिया जाए तो दुनिया का बहुत भला होगा, लेकिन वर्तमान प्राप्त जानकारी अनुसार ये सही नहीं है क्योकि सहारा रेगिस्तान से छेड़छाड़ (जैसे इसे हरा – भरा करना या बड़े पैमाने पर सोलर पैनल लगाना) वैश्विक जलवायु में कई तरह के उटपटांग परिवर्तन पैदा कर सकता है !
क्योकि सहारा की रेत भरी धूल, हवा में उड़कर अटलांटिक महासागर पार करके, अमेज़न वर्षा वनों (जो कि भारत से 2 गुना बड़े है) को आवश्यक पोषक तत्व (जैसे फास्फोरस) देती है, इसलिए इसके खत्म होने से अमेज़न जंगल (जिन्हे पृथ्वी के फेफड़े भी कहा जाता है) नष्ट हो सकतें हैं, जिसका बहुत बुरा असर अमेरिका समेत पूरी पृथ्वी की जलवायु पर पड़ेगा !
अगर सारांश में कहें तो अमेज़न जंगल नष्ट होने पर, अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में छोड़ी जाएगी, जिससे ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ेगी और इसका सीधा असर अमेरिका में गर्मी बढ़ने के रूप में दिखेगा जिससे अमेरिका में सूखे की स्थिति भयावह हो जाएगी ! इससे पश्चिमी अमेरिका में बर्फबारी (Sierra Nevada) में 50% तक कमी आ सकती है, जिससे कैलिफोर्निया में पानी का भयंकर संकट पैदा होगा और अमेरिका के तटीय इलाकों में 20% तक कम बारिश होगी ! साथ ही जेट स्ट्रीम और वायुमंडलीय पैटर्न बदल जाएंगे, जिससे अमेरिका में तूफानी मौसम या लंबे सूखे जैसे चरम मौसम की घटनाएं सामान्य हो सकती हैं !
इसलिए बेहतर यही माना जा रहा है की सहारा रेगिस्तान को हरियाली में बदलने की जगह, उसका नया प्रसार यानी उसे आगे बढ़ने से रोका जाए ताकि उसके आस पास की नयी उपजाऊ भूमि भी उसकी रेत की वजह से रेगिस्तान ना बन सके !
इसलिए ऊपर लिखे हुए 7 तरह के इकोसिस्टम के बेहतरी के लिए उचित तरीके से काम करने से, पूरे पृथ्वी के पर्यावरण पर अच्छा असर पड़ता है ! यानी ग्रासलैंड (रेंजलैंड या चारागाह) भी पर्यावरण को स्वस्थ रखने के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने की जंगल और बाकी अन्य इकोसिस्टम ! अतः हमें सूखी बंजर जमीन में तब्दील होते चरागाहों को, फिर से पुनर्जागृत करने की जरूरत है ! और चरागाहों को फिर से हरा भरा करने का सबसे सस्ता, सबसे तेज और सबसे आसान तरीका है पशुपालन !
क्योकि पशुओं के बेशकीमती गोबर – मल – मूत्र से और पशुओं के लोकोमोशन (घूमने – फिरने) से चारागाहों के स्वास्थ पर जबरदस्त अच्छा असर पड़ता है ! इसलिए सनातन धर्म में आदिकाल से पशुओं को जानवर की तरह नहीं, बल्कि “पशुधन” के रूप में आदर दिया गया है ! इसी परिप्रेक्ष्य में यह भी बताना जरूरी है कि भारतीय देशी गाय माता का गोबर व गोमूत्र सबसे अच्छा माना जाता है बंजर जमीन को भी उपजाऊ बनाने में (अधिक जानकारी के लिए कृपया यह न्यूज़ पढ़ें- गाय, भैंस या भेड़, किसके गोबर में है सबसे ज्यादा उर्वरक? जिससे बना खाद खेतों को बनाएगा उपजाऊ, यहां जानें) !

इसलिए प्राचीन काल में हर गाँव में गोचर भूमि यानी गाय माताओं के घास चरने व स्वछन्द घूमने – फिरने के लिए बड़े – बड़े चारागाह होते थे जहाँ सभी गाँव वासी अपनी गाय माताओं को रोज लाते थे ! खुद वृन्दावन भी एक गोचर स्थल था जहाँ बाल गोपाल अपनी 9 लाख गाय माताओं को रोज घास खिलाने के लिए ले जाते थे ! भगवान कृष्ण को गाय माँ की सेवा सत्कार करना कितना पसंद था, इसे उनके इन 2 श्लोकों से भी समझा जा सकता है- “गावो मेँ ह्यग्रतः सन्तु गावो मेँ सन्तु पृष्ठतः ! गावो मेँ हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्” (अर्थात्- गायें मेरे आगे रहें, गायें मेरे पीछे रहें, गायें मेरे हृदय में रहें और मैं हमेशा गायों के बीच में ही निवास करूँ) …. और …. “नमो गोभ्य: श्रीमतीभ्य: सौरभेयीभ्य: एव च ! नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नम:” (अर्थात- शोभनशील, सुरभि गाय की संतान, ब्रह्मपुत्री और परम पवित्र गौ माता को मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ) !
गोचर भूमि की इतनी लाभकारी महिमा की वजह से ही, परम बुद्धिमान व दूरदर्शी प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में, लगभग सभी भाजपा शासित प्रदेशों में गोचर भूमि के पुनर्स्थापना के प्रयास शुरू हो गए हैं (जैसे इन 3 न्यूज़ को पढ़ें- गो-संरक्षण के लिए योगी सरकार का बड़ा कदम, कब्जा मुक्त हुई 27 हजार हेक्टेयर से अधिक गोचर भूमि और गोचर भूमि से अतिक्रमण हटाने की तैयार में मोहन सरकार और Jaipur News: चरागाहों पर अब नहीं चलेगा अवैध कब्जे का खेल, पंचायती राज विभाग सख्त) !

“अंतर्राष्ट्रीय चारागाह और पशुपालक वर्ष” की यह पहल संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था, “फूड एंड एग्रीकल्चर” ऑर्गनाइजेशन (FAO) के नेतृत्व में आयोजित की जा रही है (जैसा की हमने पूर्व के आर्टिकल्स में बताया है कि इस “फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन” के उपक्रम “ग्लोबल स्वायल पार्टनरशिप” का भी “स्वयं बनें गोपाल” समूह वर्ष 2020 से पार्टनर है, जिसके बारे में अधिक जानने के लिए, कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- संयुक्त राष्ट्र संघ के नए विश्वप्रसिद्ध उपक्रम का पार्टनर बना “स्वयं बनें गोपाल” समूह) !
2023 में इस पहल का नेतृत्व जब मंगोलिया देश की सरकार द्वारा किया गया था, तब भी भारत देश समेत लगभग 60 देशों की सरकारों ने इसका समर्थन किया था (जिसके बारें में अधिक जानने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- Governments supporting Mongolia’s proposal for IYRP – as of November 2023) !
अब तक सिर्फ 9 ऐसे भारतीय कार्यक्रमों को ही “फूड एंड एग्रीकल्चर” ऑर्गनाइजेशन की वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है, जिन्होंने पर्यावरण सरंक्षण में पशुपालन की आवश्यकता के प्रति जागरूकता बढ़ायी है, जिनमें से “स्वयं बनें गोपाल” समूह का विवरण इसकी वेबसाइट पर विस्तृत रूप में देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- https://www.fao.org/rangelands-pastoralists-2026/events/detail/save-our-planete24b242a-1300-4e8c-8f3e-62c8cf682846/en
“स्वयं बनें गोपाल” समूह समेत भारत के सभी 9 कार्यक्रमों और पूरे विश्व के 102 कार्यक्रमों को भी एक साथ संक्षिप्त रूप में इसकी वेबसाइट (यानी “फूड एंड एग्रीकल्चर” ऑर्गनाइजेशन की ही वेबसाइट पर) देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- https://www.fao.org/rangelands-pastoralists-2026/events/list/en या उनमें से कुछ कार्यक्रमों के नाम निम्नलिखित लिस्ट में भी देखा जा सकता है-
• वन लैंड वन विज़न (One Land, One Vision: Integrating Rangeland and Pastoralist Solutions into Global Environmental Frameworks)
• फिल्म फेस्टिवल पर्सपेक्टिव्स ऑन पस्ट्रोलिस्म (Kiemkracht: Perspectives on Pastoralism Film Festival)
• यू के लॉन्च ऑफ़ COP 17 (UK Launch of COP17 in Mongolia & the IYRP)
• लैटिन अमेरिका & कैरेबियन रीजनल वेबिनार (Latin America & Caribbean: Regional Webinar on Sustainable Rangelands and Pastoralism)
• एग्रीएकोलॉजी कोएलिशन वेबिनार सीरीज़ (Agroecology Coalition Webinar Series #10: Agroecology & Land )
• फॅमिलिआरिज़ेशन वर्कशॉप ऑन IYRP 2026 (Familiarization workshop on the International Year of Rangelands & Pastoralism IYRP 2026 in Ethiopia)
• एशिया एंड अरब रीजन रीजनल वेबिनार (Asia and Arab Region: Regional Webinar on Sustainable Rangelands and Pastoralism)
• ओपनिंग सेरेमनी – IYRP (Opening Ceremony – International Year of Rangelands and Pastoralists 2026)
• ट्रांशमानसे ऐज ईंटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ़ ह्यूमैनिटी (Transhumance as Intangible Cultural Heritage of Humanity: A Way Forward?)
• इंटरनेशनल एग्रीकल्चरल शो (International Agricultural Show)
जय हो परम आदरणीय गौ माता की !
वन्दे मातरम् !
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण से संबन्धित आवश्यक सूचना)- विभिन्न स्रोतों व अनुभवों से प्राप्त यथासम्भव सही व उपयोगी जानकारियों के आधार पर लिखे गए विभिन्न लेखकों/एक्सपर्ट्स के निजी विचार ही “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान की इस वेबसाइट/फेसबुक पेज/ट्विटर पेज/यूट्यूब चैनल आदि पर विभिन्न लेखों/कहानियों/कविताओं/पोस्ट्स/विडियोज़ आदि के तौर पर प्रकाशित हैं, लेकिन “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान और इससे जुड़े हुए कोई भी लेखक/एक्सपर्ट, इस वेबसाइट/फेसबुक पेज/ट्विटर पेज/यूट्यूब चैनल आदि के द्वारा, और किसी भी अन्य माध्यम के द्वारा, दी गयी किसी भी तरह की जानकारी की सत्यता, प्रमाणिकता व उपयोगिता का किसी भी प्रकार से दावा, पुष्टि व समर्थन नहीं करतें हैं, इसलिए कृपया इन जानकारियों को किसी भी तरह से प्रयोग में लाने से पहले, प्रत्यक्ष रूप से मिलकर, उन सम्बन्धित जानकारियों के दूसरे एक्सपर्ट्स से भी परामर्श अवश्य ले लें, क्योंकि हर मानव की शारीरिक सरंचना व परिस्थितियां अलग - अलग हो सकतीं हैं ! अतः किसी को भी, “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान की इस वेबसाइट/फेसबुक पेज/ट्विटर पेज/यूट्यूब चैनल आदि के द्वारा, और इससे जुड़े हुए किसी भी लेखक/एक्सपर्ट के द्वारा, और किसी भी अन्य माध्यम के द्वारा, प्राप्त हुई किसी भी प्रकार की जानकारी को प्रयोग में लाने से हुई, किसी भी तरह की हानि व समस्या के लिए “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान और इससे जुड़े हुए कोई भी लेखक/एक्सपर्ट जिम्मेदार नहीं होंगे ! धन्यवाद !