कैसे यूरोपियन यूनियन द्वारा पोषित संस्था की रिपोर्ट में लिखा “स्वयं बनें गोपाल” समूह का नाम, माध्यम बना, बंजर जमीन में सब्जियाँ उगाने का

प्रतीकात्मक चित्र (Symbolic Image)
यह घटना हमारे एक आदरणीय पाठक के साथ हुई थी, जो कि उत्तर भारत के एक महानगर के एक पॉश कॉलोनी में रहते हैं और उन्होंने ही हमें इस घटना के बारे में जानकारी देकर, प्रकाशन करने का निवेदन किया था ताकि उन्ही की तरह परेशान अन्य लोग भी लाभान्वित हो सकें !
उन पाठक ने हमें बताया कि उन्हें गार्डनिंग (बागवानी) करने का बहुत शौक था इसलिए उन्होंने अपने घर में कई वर्ष पहले काफी लम्बा – चौड़ा एक गार्डन (बगीचा) बनवाया था जिसमें उन्होंने शुरू – शुरू में कई महंगे फल – फूल आदि खरीदकर लगाए थे लेकिन ना जाने क्यों उनके सभी पौधे कुछ ही महीने में सूखकर मुरझा गए थे, जबकि उन्होंने पौधों की खाद – पानी आदि जैसी देखभाल नियम से की थी !
इसलिए इसके बाद उन्होंने सोचा की अब किसी एक्सपर्ट की मदद लेनी चाहिए तो उन्होंने ऑनलाइन इन्क्वायरी करके अपने शहर के एक प्रसिद्ध फर्टिलाइजर डीलर (खाद विक्रेता) से सम्पर्क किया ! तब उस विक्रेता ने, उन्हें विभिन्न तरह के केमिकल्स युक्त फर्टिलाइज़र्स (रासायनिक खाद) और पेस्टिसाइड्स (कीटनाशक) दिए, जिसे गार्डन में डालकर उन्होंने फिर से फल – फूल के नए पौधे लगाए !
लेकिन इस बार तो उनके पौधे और जल्दी मुरझा गए ! तो तब उन्होंने, उस फर्टिलाइजर डीलर से फिर से सम्पर्क करके इस समस्या के बारे में बताया तो उस डीलर ने उन्हें सलाह दी की हो सकता है कि आपके गार्डन में सूरज की कड़ी धूप बहुत देर तक पड़ती हो इसलिए पौधे मुरझा जाते हों, इसलिए आप पॉलीहाउस फार्मिंग (Poly House Farming) तकनीकी इस्तेमाल करिये !
वास्तव में वो पाठक, अपने खुद के बगीचे में रंग – बिरंगे फूल और हरी – भरी सब्जियां को देखने के लिए इतना तरस रहे थे कि वो पॉलीहाउस फार्मिंग के लिए भी तैयार हो गए और उन्होंने हजारों रूपये खर्च करके, अपने पूरे गार्डन को मेटल पिलर्स (धातु के खम्बों) से घेरवा दिया, और चारो तरफ से तरफ से प्लास्टिक शीट से ढकवा दिया ताकि डायरेक्ट सनलाइट (कड़ी धूप) की जगह, हल्का सूर्य प्रकाश और हवा पौधों तक पहुँच सके, साथ ही उसके अंदर पौधों को ऑटोमैटिक पानी देने वाला सिस्टम भी लगवाया ताकि पानी देने में जरा भी लापरवाही ना हो सके !
पॉलीहाउस बनवाने के बाद उन्होंने फिर से फल – फूल के नए पौधे लगाए, लेकिन इससे भी कोई खास फायदा मिला नहीं और पौधे अन्ततः सूख गए ! अब उन्हें ये सोच – सोचकर हताशा हो रही थी कि जहाँ दुनिया में बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो मामूली डिब्बे – बोतल – कबाड़ – बल्ब आदि में भी पौधे लगा देते हैं और उनके पौधे आराम से उग जाते हैं जबकि वही दूसरी तरफ वो हैं जो अब तक इतना रूपये फूंक चुकें हैं लेकिन पौधे उगने का नाम ही नहीं ले रहें हैं !
खैर, उन्होंने सोचा की इस बार गार्डेनिंग का पूरा काम, वो किसी ऐसे एक्सपर्ट से करवाएंगे, जो यह काम खुद कई बार सफलतापूर्वक कर चुका हो ! इसलिए उन्होंने ऑनलाइन इन्क्वायरी करके अपने शहर के एक प्रसिद्ध गार्डनर (माली) को बुलाया और माली ने उनके गार्डन का मुआयना करके आश्वासन दिया कि बिल्कुल उनके गार्डन में उनके मनमुताबिक पौधे उग सकते हैं, लेकिन उन्हें पहले पॉलीहाउस सेटअप को वापस हटवाना पड़ेगा ताकि पौधों तक पर्याप्त सूर्य प्रकाश पहुँच सके !

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माली की बात सुनकर उन्हें दुःख जरूर पहुंचा क्योकि मात्र कुछ ही महीने पहले उन्होंने काफी पैसा खर्च करके पॉलीहाउस बनवाया था, लेकिन अपने गार्डन में हरे – भरे पौधे देखने के लिए, वो कुछ भी करने को तैयार थे इसलिए उन्हें पूरा पॉलीहाउस उखड़वाकर कबाड़ में बेच दिया और माली को खुली छूट देते हुए कहा की जो कुछ भी जरूरी है वो सब करो लेकिन इस गार्डन में मुझे हरे – भरे पौधे चाहिए !
फिर उस माली ने भी काफी मेहनत की, उस गार्डन की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने की ! सबसे पहले माली ने उस गार्डन से कई टन मिटटी खोदकर बाहर निकाल दी और उसकी जगह किसी खेत से उपजाऊ मिटटी मंगवाकर भर दी ! फिर हर तरह की नियमित देखभाल करते हुए उसने नए – नए पौधे बोये और इस बार पौधे स्वस्थ तरीके से बढ़ने लगे, जिसे देखकर वो पाठक बहुत खुश हुए !
जब अगले एक – दो महीने तक पौधे ठीक तरीके से बढ़ने लगे तो माली ने कहा की अब मेरा कॉन्ट्रैक्ट (जिम्मेदारी) ख़त्म हुआ, अब इसके बाद आप खुद ही पौधों में नियमित खाद – पानी देते रहेंगे तो पौधे कभी खराब नहीं होंगे ! आश्चर्य की बात है कि माली के जाने, एक महीने बाद से ही पौधे फिर से मुरझाने लगे, तो उन पाठक ने तुरंत माली को वापस बुलाकर कारण पूछा तो माली को भी कुछ समझ में नहीं आया !
खैर माली ने कहा की मै फिर से कुछ दिनों तक पौधों की देखभाल कर दे रहा हूँ जिससे पौधे फिर से स्वस्थ हो जाएंगे ! इस बार माली ने लगभग एक महीने तक बहुत प्रयास किये, लेकिन अंततः सभी पौधे मुरझा गए ! अब उन पाठक को वाकई में समझ में नहीं आ रहा था कि “वो करें तो क्या करें” क्योकि अब तक तो वो सब कुछ करके देख चुके थे !
उनके किसी परिचित ने सलाह दी की हो सकता हो कि उनका गार्डन, वास्तुशास्त्र के हिसाब से सही दिशा में ना हो, क्योकि अगल – बगल सभी पड़ोसियों के घर के गार्डन में तो पौधे आसानी से उग रहें हैं, बस उनके ही घर में पौधे उगने में प्रॉब्लम होती थी ! लेकिन पाठक महोदय के हिसाब से, इस वास्तुदोष का कोई इलाज भी नहीं हो सकता था क्योकि गार्डन कोई कमरा तो है नहीं, की जब चाहे बदल दिया !
खैर उन पाठक ने सोचा कि अब इस बार कोई नया नुस्खा आजमाने से पहले, उन्हें पौधों को उगाने से सबंधित जानकारी बढ़ानी चाहिए ! इसलिए उन्होंने गूगल (Google) पर इससे संबंधित आर्टिकल्स पढ़ना शुरू किया ! उन्हें अधिकाँश जगह, यही जानकारी पढ़ने को मिली कि आर्गेनिक फार्मिंग (Organic Farming; जैविक खेती) सबसे अच्छी होती है !

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गूगल में ही आर्गेनिक फार्मिंग के बारे में जानकारी खोजते समय, उन्हें यह रिपोर्ट पढ़ने को मिली- https://icoel.dk/media/g55asmzi/regenerativt-landbrug-bestyrelsesmoede-i-icrofs-04-03-2025.pdf ! यह रिपोर्ट “इन्नोवेशन सेण्टर फॉर आर्गेनिक फार्मिंग” (Innovation Center for Organic Farming; https://icoel.dk/) संस्था की है जो कि 27 यूरोपियन देशों के सरकारों के संगठन यानी “यूरोपियन यूनियन” (European Union ; https://european-union.europa.eu/) द्वारा फंडेड (पोषित) है, और संयुक्त राष्ट्र संघ के मानकों के अनुसार, रिसर्च वर्क्स द्वारा आर्गेनिक फार्मिंग का संवर्धन करती है !
चूंकि यह संस्था “इन्नोवेशन सेण्टर फॉर आर्गेनिक फार्मिंग” यूरोप में स्थित, डेनमार्क देश में है इसलिए इसकी यह 19 पेज की रिपोर्ट, डेनमार्क की भाषा डेनिश में हैं (जिसे ऑनलाइन ट्रांसलेटर द्वारा हिंदी में परिवर्तित करके पढ़ा जा सकता है) ! उन पाठक ने इसी रिपोर्ट के पेज नंबर 12 पर, इंग्लिश भाषा में लिखा हुआ, भारतवर्ष की संस्था “स्वयं बनें गोपाल” समूह का नाम देखा !
उसके बाद उन पाठक ने गूगल पर अलग से “स्वयं बनें गोपाल” समूह के बारे सर्च किया और फिर हमारी वेबसाइट पर आकर, हमारे द्वारा 9 साल पहले प्रकाशित यह आर्टिकल पढ़ा- जानिये सोना फसल उगाने वाली आयुर्वेदिक खाद व कीटनाशक का जबरदस्त फार्मूला
प्रथम दृष्टया उन्हें इस आर्टिकल में साइंटिफिक एविडेंस कम और गाय माता के प्रति ब्लाइंड फेथ (अंधविश्वास) ज्यादा लगा ! खैर आर्टिकल पढ़कर, उन पाठक महोदय ने सोचा कि एक बार गाय माता से संबंधित, इस प्रयोग को भी कर लेने में कोई हर्ज नहीं है क्योकि जहाँ एक तरफ उन्होंने अब तक लाखों रूपये फूंक दिए मॉडर्न तरीके से गार्डनिंग करने में लेकिन कोई सफलता नहीं मिली, तो एक बार इस बेहद सस्ते तरीके को भी आजमाने में कोई दिक्क्त नहीं है !
तो इस नुस्खे को बनाने के लिए जो सबसे मेन इंग्रेडिएंट्स चाहिए था, वो था देशी गाय माँ का गोबर ! अब गोबर कहाँ मिलेगा यह जानने के लिए उन्होंने ऑनलाइन खोज की तो उन्हें पता चला की उनके घर से कुछ किलोमीटर दूर एक गौशाला है ! गौशाला जाने के बाद पता चला की थोड़ा गोबर तो एकदम मुफ्त में मिल जाएगा, लेकिन गोमूत्र उपलब्ध नहीं हैं क्योकि उस गौशाला ने गोमूत्र इकठ्ठा करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी !
खैर उन पाठक ने गौर किया कि उस गौशाला में सभी गाय माँ जब – जब भी पेशाब करती हैं, तब – तब उस पेशाब की थोड़ी सी मात्रा उनके जमीन में पड़े हुए गोबर के ढ़ेर में भी समा जाती है (जबकि बेशकीमती पेशाब की अधिकाँश मात्रा धीरे – धीरे सूखकर, भांप बनकर व्यर्थ उड़ जाती है) ! इसलिए उन गोबर के ढ़ेर में अपने आप थोड़ा सा गोमूत्र मिला हुआ था ! अतः उन पाठक ने निर्णय लिया की उन्हें अलग से गोमूत्र खरीदकर, गोबर में मिलाने की जरूरत नहीं है ! और फिर वो उस गोमूत्र मिले हुए, 15 किलो गोबर को खरीदकर एक बोरे में भरकर घर ले आये !
फिर घर में उन्होंने एक प्लास्टिक के ड्रम में, उस गोबर को भर दिया ! उसके बाद, उस गोबर में हमारे आर्टिकल में दी गयी जानकारी के अनुसार- 200 लीटर पानी, बाज़ार से खरीदकर लाया हुआ बेसन (1 किलो), गुड़ (1 किलो), 1 लीटर देशी गाय माँ के दूध से बनी हुई दही (जो उन्होंने उसी गौशाला से खरीद ली थी) और 1 मुट्ठी बरगद के पेड़ के नीचे की मिटटी भी मिला दिया !
फिर इस ड्रम को एक कोने में छाया में ढ़ककर रख दिया और रोज इस घोल को डंडे से 1 – 2 मिनट के लिए हिलाते थे ताकि इस घोल में, अच्छे जीवाणु (Good Bacteria) अधिक से अधिक पैदा हो सकें !
जब 15 दिन बाद यह घोल यानी जीवामृत खाद तैयार हो गयी तब उन्होंने इस जीवामृत घोल को, अपने गार्डन में विधिवत् छिड़क दिया ! इस छिड़काव वाली प्रक्रिया के पूरे होने के, मात्र 1 हफ्ते के अंदर ही उन्हें अपने पौधों में फिर से जान आते महसूस हुई ! जिसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि हर 21 दिन बाद वो इस खाद का छिड़काव करते रहेंगे !
केवल इस खाद की मदद से, उन पाठक के गार्डन की अवस्था दिनों – दिन सुधार की तरफ बढ़ने लगी है, जिसकी वजह से वे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने हमें बारम्बार धन्यवाद देते हुए निवेदन किया है कि इस घटना को परोपकार्थ प्रकाशित करने के लिए, ताकि उन्ही की तरह परेशान अन्य लोग भी लाभन्वित हो सकें और साथ ही भारतीय देशी गाय माँ की इस प्रचंड महिमा को भी लोग समझ सकें कि कैसे गोबर व गोमूत्र से खेती का पैदावार इतनी ज्यादा बढ़ाई जा सकती है कि दुनिया में कोई भी आदमी, कभी भूखा ना सोये !
इसी सन्दर्भ में यहाँ पर एक आवश्यक सूचना का वर्णन करना भी जरूरी है कि- शुरुआत में इन पाठक महोदय ने हमारा आर्टिकल पढ़ने के बाद, सबसे पहले हमसे ही सम्पर्क किया था जीवामृत खाद खरीदने लिए, लेकिन हमने उन्हें बताया कि वर्तमान में “स्वयं बनें गोपाल” समूह किसी भी तरह के उत्पादन कार्य का निष्पादन नहीं करता है, इसलिए वे पाठक चाहें तो हमारे आर्टिकल में दी गयी आसान विधि के अनुसार खुद ही अपने घर में जीवामृत बना लें या किसी अन्य विक्रेता से खरीद लें !
इस पर इन पाठक महोदय का कहना था कि आपके दुर्लभ जानकारी युक्त आर्टिकल्स पढ़ने के बाद, जिस स्तर का विश्वास आपकी संस्था पर बना है, वैसा विश्वास शायद किसी और पर कर पाना मुश्किल होगा इसलिए किसी और विक्रेता से जीवामृत खरीदने की जगह, खुद ही बना लेना ज्यादा ठीक रहेगा !
चूंकि ये पाठक महोदय अपने गार्डनिंग के शौक के लिए बेहद जुनूनी थे इसलिए इन्होने कैसे भी मेहनत करके अन्ततः अपने लिए जीवामृत बना लिया, लेकिन पिछले लगभग 10 वर्षों से ना जाने कितने ही सज्जनों ने हमसे सम्पर्क किया है गाय माँ आधारित उत्पादों को खरीदने के लिए क्योकि उनमें से अधिकाँश सज्जनों के साथ भी यही समस्या थी की वो अपने घर में गोबर की खाद, खुद से बंनाने में असमर्थ हैं !
असमर्थ होने की भी यही समान्य वजहें हैं, जैसे- गाय का इतना ज्यादा गोबर कहाँ मिलेगा, गोमूत्र कहाँ मिलेगा, अगर गोबर – गोमूत्र मिल भी गया तो खाद बनाने के दौरान पैदा होने वाली महक की वजह से अपार्टमेंट/फ्लैट में रहने वाले पड़ोसी शिकायत कर सकते हैं आदि ! इन्ही मजबूरियों की वजह से, शहरों में रहने वाले लोगों के लिए ऑनलाइन आर्डर करके, आर्गेनिक खाद मंगाना ज्यादा आसान पड़ता हैं !
वैसे आजकल शहरों के अधिकांश घरों में भी छोटी – मोटी बागवानी देखने को मिल जाती है क्योकि निश्चित रूप से घर में हरा पौधा होने से मन को शांति मिलती है ! संभवतः इन्ही वजहों से अब विश्व में ऑर्गेनिक खाद की बिक्री सालाना लगभग 1 लाख करोड़ तक पहुँच रही है और भारतदेश, देशी गाय माँ के गोबर व गोमूत्र का सबसे बड़ा उत्पादक देश है जो कि ऑर्गनिक खाद के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है ! भारतीय गोबर की डिमांड विदेशों में कितनी ज्यादा बढ़ती जा रही हैं, इसे निम्नलिखित मीडिया न्यूज़ को पढ़कर भी जाना जा सकता है-
भारत के लिए सोने की खदान है गाय का गोबर, अरब देशों और चीन में भारी डिमांड
50 रुपए किलो में भारत से गोबर खरीद रहे विदेशी देश ! बढ़ती डिमांड की वजह चौंकाने वाली
दूध के बराबर पहुंची गोबर की कीमत, विदेशों में बढ़ रही मांग, जानें क्या है वजह
UAE और कतर के पड़ोसी देश को लाखों किलो गोबर बेच रहा भारत
कुवैत को गाय के गोबर की जरूरत, यूपी समेत इन दो राज्यों ने भर दिए कंटेनर, आज रवाना
अमेरिका के स्टोर में गोबर के मेड इन इंडिया उपले, जानिए कीमत
Cow का गोबर हुआ International, America में 214 रुपयों में बिक रहे हैं 10 उपले
हालांकि ऑर्गेनिक खाद की बिक्री का मार्केट कैप, सम्पूर्ण खाद की बिक्री की तुलना में काफी कम है क्योकि हर वर्ष लगभग 40 लाख करोड़ की खाद बिकती है विश्व में ! इसलिए इसको अगर पॉजिटिव नजरिये से देखा जाए तो आर्गेनिक खाद के मैनुफैक्चरर्स के लिए अपार संभावनाएं है अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए, क्योकि पृथ्वी का पर्यावरण हर प्रकार से स्वास्थ्यप्रद बना रहे इसलिए बहुत जरूरी है कि सभी देशों में हर तरह के केमिकल्स से रहित, सिर्फ आर्गेनिक खाद का ही इस्तेमाल हो (और खाद की डिमांड कभी ख़त्म नहीं हो सकती है क्योकि बिना अनाज का अधिक से अधिक उत्पादन किये हुए, दुनिया का पेट नहीं भरने वाला है) !
इसलिए “स्वयं बनें गोपाल” सभी देश भक्त नागरिकों से आवाहन करता है कि आर्गेनिक खाद के प्रचार – प्रसार – उपयोग – निर्माण आदि में अधिक से अधिक सहयोग करके, ना केवल मानव जीवन को सुरक्षित करिये बल्कि गोबर – गोमूत्र की डिमांड बढ़ाकर, बूढ़ी – बीमार – घायल – दूध देने में अक्षम गौमाता को भी कत्लखाने जाने से बचाकर अथाह पुण्य कमाईये !
जय हो परम आदरणीय गौ माता की !
वन्दे मातरम् !
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