कहानी – सुहाग की साड़ी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

यह कहना भूल है कि दाम्पत्य-सुख के लिए स्त्री-पुरुष के स्वभाव में मेल होना आवश्यक है। श्रीमती गौरा और श्रीमान् कुँवर रतनसिंह में कोई बात न मिलती थी। गौरा उदार

लेख – सोयी हुई जातियाँ पहले जगेंगी – (लेखक – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)

”न निवसेत् शूद्रराज्ये” मनु का यह कहना बहुत बड़ा अर्थ-गौरव रखता है। शूद्रों के राज्य में रहने से ब्राह्मण-मेधा नष्ट हो जाती है। पर यह यवन और गौरांगों के 800

कहानी – वैर का अंत – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रामेश्वरराय अपने बड़े भाई के शव को खाट से नीचे उतारते हुए भाई से बोले-तुम्हारे पास कुछ रुपये हों तो लाओ, दाह-क्रिया की फिक्र करें, मैं बिलकुल खाली हाथ हूँ।

कहानी – छोटा जादूगर (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों

कहानी – निर्वासन – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो! मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?   परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और

कहानी – स्वर्ग की देवी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

भाग्य की बात! शादी-विवाह में आदमी का क्या अख्तियार! जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों- ब्राह्मणों ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य

कहानी – ममता (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

रोहतास-दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गम्भीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था। मन

कहानी – कौशल – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पंडित बालकराम शास्त्री की धर्मपत्नी माया को बहुत दिनों से एक हार की लालसा थी और वह सैकड़ों ही बार पंडितजी से उसके लिए आग्रह कर चुकी थी; किंतु पंडितजी

कहानी – व्रत-भंग (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

चैत्र-कृष्णाष्टमी का चन्द्रमा अपना उज्ज्वल प्रकाश ‘चन्द्रप्रभा’ के निर्मल जल पर डाल रहा है। गिरि-श्रेणी के तरुवर अपने रंग को छोड़कर धवलित हो रहे हैं; कल-नादिनी समीर के संग धीरे-धीरे

कई रोगों का नाश मुफ्त में करती हैं डाला छठ पर भगवान सूर्य से निकलने वाली दिव्य किरणें

बिहार में जिसे डाला छठ कहते हैं, असल में एक बहुत साइंटिफिक त्यौहार है और इसका महत्व समझना आज के वैज्ञानिकों के लिए मुश्किल काम हैं क्योंकि वे भगवान सूर्य

कहानी – नैराश्य लीला – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पंडित हृदयनाथ अयोध्याय के एक सम्मानित पुरुष थे। धनवान् तो नहीं लेकिन खाने-पीने से खुश थे। कई मकान थे, उन्हीं के किराये पर गुजर होता था। इधर किराये बढ़ गये

कहानी – सुनहला साँप (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

”यह तुम्हारा दुस्साहस है, चन्द्रदेव!” ”मैं सत्य कहता हूँ, देवकुमार।”   ”तुम्हारे सत्य की पहचान बहुत दुर्बल है, क्योंकि उसके प्रकट होने का साधन असत् है। समझता हूँ कि तुम

कहानी – नैराश्य – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

संध्या का समय था। कचहरी उठ गयी थी। अहलकार और चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे-वैसे मिल जायँ। कचहरी के