अनायास कृपा बरसने का समय आ गया

जगदम्बा वैसे ही माँ होने के नाते जल्दी पिघल जाती है और ऊपर से नवरात्रि !! नवरात्रि में तो अनायास ही उनकी कृपा बरसती है बस जरुरत है लूटने वाली

कहानी – आभूषण – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

आभूषणों की निंदा करना हमारा उद्देश्य नहीं है। हम असहयोग का उत्पीड़न सह सकते हैं पर ललनाओं के निर्दय घातक वाक्बाणों को नहीं ओढ़ सकते। तो भी इतना अवश्य कहेंगे

कहानी – पंचायत (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

मन्दाकिनी के तट पर रमणीक भवन में स्कन्द और गणेश अपने-अपने वाहनों पर टहल रहे हैं। नारद भगवान् ने अपनी वीणा को कलह-राग में बजाते-बजाते उस कानन को पवित्र किया,

कहानी – त्यागी का प्रेम – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

लाला गोपीनाथ को युवावस्था में ही दर्शन से प्रेम हो गया था। अभी वह इंटरमीडियट क्लास में थे कि मिल और बर्कले के वैज्ञानिक विचार उनको कंठस्थ हो गये थे।

कविताएँ – (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

आह ! वेदना मिली विदाई आह ! वेदना मिली विदाई मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई   छलछल थे संध्या के श्रमकण आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण मेरी यात्रा

कहानी – जुगनू की चमक – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पंजाब के सिंह राजा रणजीतसिंह संसार से चल चुके थे और राज्य के वे प्रतिष्ठित पुरुष जिनके द्वारा उनका उत्तम प्रबंध चल रहा था परस्पर के द्वेष और अनबन के

नाटक – प्रथम अंक – अजातशत्रु (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

प्रथम दृश्य स्थान – प्रकोष्ठ   राजकुमार अजातशत्रु , पद्मावती , समुद्रदत्त और शिकारी लुब्धक।     अजातशत्रु : क्यों रे लुब्धक! आज तू मृग-शावक नहीं लाया। मेरा चित्रक अब

कहानी – मंत्र – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पंडित लीलाधर चौबे की जबान में जादू था। जिस वक्त वह मंच पर खड़े हो कर अपनी वाणी की सुधावृष्टि करने लगते थे; श्रोताओं की आत्माएँ तृप्त हो जाती थीं,

नाटक – कथा-प्रसंग – अजातशत्रु (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

इतिहास में घटनाओं की प्रायः पुनरावृत्ति होते देखी जाती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसमें कोई नई घटना होती ही नहीं। किन्तु असाधारण नई घटना भी भविष्यत् में

कहानी – सोहाग का शव – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मध्यप्रदेश के एक पहाड़ी गॉँव में एक छोटे-से घर की छत पर एक युवक मानो संध्या की निस्तब्धता में लीन बैठा था। सामने चन्द्रमा के मलिन प्रकाश में ऊदी पर्वतमालाऍं

कहानी – गृह-दाह – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

सत्यप्रकाश के जन्मोत्सव में लाला देवप्रकाश ने बहुत रुपये खर्च किये थे। उसका विद्यारम्भ-संस्कार भी खूब धूम-धाम से किया गया। उसके हवा खाने को एक छोटी-सी गाड़ी थी। शाम को

नाटक – तृतीय अंक – अजातशत्रु (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

प्रथम दृश्य स्थान – मगध में राजकीय भवन   छलना और देवदत्त।       छलना : धूर्त्त! तेरी प्रवंचना से मैं इस दशा को प्राप्त हुई। पुत्र बन्दी होकर

कविताएँ – निर्वेद सर्ग – कामायनी (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

भाग-1 वह सारस्वत नगर पडा था क्षुब्द्ध,   मलिन, कुछ मौन बना,   जिसके ऊपर विगत कर्म का   विष-विषाद-आवरण तना।     उल्का धारी प्रहरी से ग्रह-   तारा