कहानी – बलिदान – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मनुष्य की आर्थिक अवस्था का सबसे ज्यादा असर उसके नाम पर पड़ता है। मौजे बेला के मँगरू ठाकुर जब से कान्सटेबल हो गए हैं, इनका नाम मंगलसिंह हो गया है।

आत्मकथा – पं. जगन्नाथ पाँडे – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अब मैं चौदह साल का हो चला था कि रामलीला-मण्‍डली से छुट्टी मनाने बड़़े भाई के संग चुनार आया। इस बार अलीगढ़ में किसी बात पर महन्‍त राममनोहरदास और मेरे

कहानी – रमला (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

साजन के मन में नित्य वसन्त था। वही वसन्त जो उत्साह और उदासी का समझौता कराता, वह जीवन के उत्साह से कभी विरत नहीं, न-जाने कौन-सी आशा की लता उसके

आत्मकथा – लाला भगवान ‘दीन’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अरसा हुआ वाराणसी के दैनिक अखबार ‘आज’ में आदरणीय पं. श्रीकृष्‍णदत्तजी पालीवाल की चर्चा करते हुए मैंने लिखा था कि मेरे पाँच गुरु हैं, जिनमें एक पालीवालजी भी हैं। उन

कहानी – ज्वालामुखी – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

डिग्री लेने के बाद मैं नित्य लाइब्रेरी जाया करता। पत्रों या किताबों का अवलोकन करने के लिए नहीं। किताबों को तो मैंने न छूने की कसम खा ली थी। जिस

आत्मकथा – पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

यह चर्चा सन् 1920 और 21 ई. के बीच की होगी। यह सब मैं स्‍मरण से लिख रहा हूँ, क्‍योंकि डायरी रखने की आदत मैंने नहीं पाली, इस ख़ौफ़ से

कहानी – करुणा की विजय (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

सामने सन्ध्या-धूसरति जल की एक चादर बिछी है। उसके बाद बालू की बेला है, उसमें अठखेलियाँ करके लहरों ने सीढ़ी बना दी है। कौतुक यह है कि उस पर भी

आत्मकथा – बाबू शिवप्रसाद गुप्त’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

तो? तो क्‍या बाबू शिवप्रसाद गुप्‍त को भी स्‍वर्ग के फाटक से नहीं गुज़रने दिया गया? बाइबिल में लिखा है : सुई के सूराख़ से ऊँट निकल जाए — भले,

कहानी – सच्चाई का उपहार – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

तहसीली मदरसा बराँव के प्रथमाध्यापक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारियों में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियाँ लगा रखी थीं। दरवाजों पर लताएँ चढ़ा दी थीं। इससे

आत्मकथा – पं. कमलापति त्रिपाठी – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सो, तुम जीते – कमला, और बहुत ख़ूब जीते। अभी गत कल ही की तो बात है। तुम प्रादेशिक साहित्‍य-सम्‍मेलन के अध्‍यक्ष बने थे (सन् 1948-49)। उन्‍हीं दिनों लखनऊ में

कहानी – देवरथ – (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

दो-तीन रेखाएँ भाल पर, काली पुतलियों के समीप मोटी और काली बरौनियों का घेरा, घनी आपस में मिली रहने वाली भवें और नासा-पुट के नीचे हलकी-हलकी हरियाली उस तापसी के

आत्मकथा – बनारस और कलकत्ता – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्‍टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी

कहानी – मूठ – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य ही कहिए या व्यावसायिक सिद्धान्तों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका

आत्मकथा – जीवन-संक्षेप – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सन् 1921 ई. में जेल से आने के बाद नितान्‍त ग़रीबी में, ग़रीब रेट पर, ‘आज’ में मैं सन् 1924 के मध्‍य तक राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के पक्ष में प्रचारात्‍मक कहानियाँ,

कहानी – विराम-चिह्न (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

देव-मन्दिर के सिंहद्वार से कुछ दूर हट कर वह छोटी-सी दुकान थी। सुपारी के घने कुञ्ज के नीचे एक मैले कपड़े पर सूखी हुई धार में तीन-चार केले, चार कच्चे

आत्मकथा – असंबल गान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

उपदेशक— तेरी कन्‍था के कोने में कुछ संबल, या संशय है, अरे पथिक, होने में? तेरी. यदि कुछ हो न ठहरता जा ना, कन्‍था अपनी भरता जा ना, करम दिखा