अनुवाद – ध्रुवनिवासी रीछ का शिकार (तोल्सतोय) – (लेखक – प्रेमचंद)

हम एक दिन रीछ के शिकार को निकले। मेरे साथी ने एक रीछ पर गोली चलाई। वह गहरी नहीं लगी। रीछ भाग गया। बर्फ पर लहू के चिह्न बाकी रह

अनुवाद – प्रेम में परमेश्वर (तोल्सतोय) – (लेखक – प्रेमचंद)

किसी गांव में मूरत नाम का एक बनिया रहता था। सड़क पर उसकी छोटीसी दुकान थी। वहां रहते उसे बहुत काल हो चुका था, इसलिए वहां के सब निवासियों को

अनुवाद – मनुष्य का जीवन आधार क्या है (तोल्सतोय) – (लेखक – प्रेमचंद)

माधो नामी एक चमार जिसके न घर था, न धरती, अपनी स्त्री और बच्चों सहित एक झोंपड़े में रहकर मेहनत मजदूरी द्वारा पेट पालता था। मजूरी कम थी, अन्न महंगा

अनुवाद – मूर्ख सुमंत (तोल्सतोय) – (लेखक – प्रेमचंद)

एक समय एक गांव में एक धनी किसान रहता था। उसके तीन पुत्र थे-विजय सिपाही, तारा वणिक, सुमंत मूर्ख। गूंगीबहरी मनोरमा नाम की एक कुंवारी कन्या भी थी। विजय तो

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 2 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आजाद की धाक ऐसी बँधी कि नवाबों और रईसों में भी उनका जिक्र होने लगा। रईसों को मरज होता है कि पहलवान, फिकैत, बिनवटिए को साथ रखें, बग्घी पर ले

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 3 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

नवाब साहब के दरबार में दिनोंदिन आजाद का सम्मान बढ़ने लगा। यहाँ तक कि वह अक्सर खाना भी नवाब के साथ ही खाते। नौकरों को ताकीद कर दी गई कि

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 4 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आजाद यह तो जानते ही थे कि नवाब के मुहाहबों में से कोई चौक के बाहर जानेवाला नहीं इसलिए उन्होंने साँड़नी तो एक सराय में बाँध दी और आप अपने

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 5 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

मियाँ आजाद की साँड़नी तो सराय में बँधी थी। दूसरे दिन आप उस पर सवार हो कर घर से निकल पड़े। दोपहर ढले एक कस्बे में पहुँचे। पीपल के पेड़

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 6 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

मियाँ आजाद मुँह-अँधेरे तारों की छाँह में बिस्तर से उठे, तो सोचे; साँड़नी के घास-चारे की फिक्र करके सोचा कि जरा अदालत और कचहरी की भी दो घड़ी सैर कर

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 7– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

मियाँ आजाद साँड़नी पर बैठे हुए एक दिन सैर करने निकले, तो एक सराय में जा पहुँचे। देखा, एक बरामदे में चार-पाँच आदमी फर्श पर बैठे धुआँधार हुक्के उड़ा रहे

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 8– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

एक दिन मियाँ आजाद सराय में बैठे सोच रहे थे, किधर जाऊँ कि एक बूढ़े मियाँ लठिया टेकते आ खड़े हुए और बोले – मियाँ, जरी यह खत तो पढ़

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 9– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आजाद को नवाब साहब के दरबार से चले महीनों गुजर गए, यहाँ तक कि मुहर्रम आ गया। घर से निकले, तो देखते क्या हैं, घर-घर कुहराम मचा हुआ है, सारा

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 10– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

वसंत के दिन आए। आजाद को कोई फिक्र तो थी ही नहीं, सोचे, आज वसंत की बहार देखनी चाहिए। घर से निकल खड़े हुए, तो देखा कि हर चीज जर्द

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 12– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आजाद तो इधर साँड़नी को सराय में बाँधे हुए मजे से सैर-सपाटे कर रहे थे, उधर नवाब साहब के यहाँ रोज उनका इंतिजार रहता था कि आज आजाद आते होंगे

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 11– (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

एक दिन आजाद शहर की सैर करते हुए एक मकतबखाने में जा पहुँचे। देखा, एक मौलवी साहब खटिया पर उकड़ू बैठे हुए लड़कों को पढ़ा रहे हैं। आपकी रँगी हुई

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 13 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

इधर शिवाले का घंटा बजा ठनाठन, उधर दो नाकों से सुबह की तोप दगी दनादन। मियाँ आजाद अपने एक दोस्त के साथ सैर करते हुए बस्ती के बाहर जा पहुँचे।