ये प्रसंग है, अनन्त ब्रह्माण्ड नायक योगेश्वर श्री कृष्ण और उनके परम प्रिय पांडु पुत्रों का | महाभारत के अति भीषण युद्ध में जीत के बाद जब सब कुछ सामान्य
पिता रत्नाकरो यस्य, लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शङ्खो भिक्षाटनं कुर्यात्, फलं भाग्यानुसारतः ।। मतलब – पिता जिसका सागर है, और लक्ष्मी जिसकी बहन है (यहाँ शंख की बात हो रही
ये कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि हार्ड कोर, वेरी एनसीएन्ट साइंस है जिसका नाम है “योग” जिसके प्रथम प्रणेता थे अनन्त शक्तिशाली, जन्म – मृत्यु से रहित, सबको बनाने,
वैसे तो उड़ीसा के पुरी मंदिर को कलियुग का साक्षात मोक्षदायिनी तीर्थ कहा गया है और जहा साक्षात जगन्नाथ भगवान कृष्ण विराजते हो उस स्थल पर अनगिनत दृश्य – अदृश्य
मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने भी उस रामपथ को खोजने की शुरूआत की है जो अयोध्या से चित्रकूट होता हुआ दण्डकारण क्षेत्र से पंचवटी होते हुआ रामेश्वरम जाता है !
(श्री विवेकानंद का भाषण सन 1893 में, अमेरिका के शिकागो में)- अमेरिका के बहनो और भाइयों, आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया
ध्यान की विभिन्न स्थितियों का अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया हैं कि ध्यान (dhyan) की अतल गहराई में प्रविष्ट होने पर साधक के शारीरिक एवं मानसिक क्रिया-कलापों में एकरसता-