कहानी – प्रलय (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

हिमावृत चोटियों की श्रेणी, अनन्त आकाश के नीचे क्षुब्ध समुद्र! उपत्यका की कन्दरा में, प्राकृतिक उद्यान में खड़े हुए युवक ने युवती से कहा-”प्रिये!” ”प्रियतम! क्या होने वाला है?”  

कहानी – सुजान भगत – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

सीधे-सादे किसान धन हाथ आते ही धर्म और कीर्ति की ओर झुकते हैं। दिव्य समाज की भाँति वे पहले अपने भोग-विलास की ओर नहीं दौड़ते। सुजान   की खेती में

उपन्यास – कंकाल, भाग -1 (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

प्रतिष्ठान के खँडहर में और गंगा-तट की सिकता-भूमि में अनेक शिविर और फूस के झोंपड़े खड़े हैं। माघ की अमावस्या की गोधूली में प्रयाग में बाँध पर प्रभात का-सा जनरव

कहानी – आत्म-संगीत – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

आधी रात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिबिम्ब लहरों के साथ चंचल। एक स्वर्गीय संगीत की मनोहर और जीवनदायिनी, प्राण-पोषिणी घ्वनियॉँ

कहानी – ईश्वरीय न्याय – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन अनाज

उपन्यास – कंकाल, भाग -3 (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

श्रीचन्द्र का एकमात्र अन्तरंग सखा धन था, क्योंकि उसके कौटुम्बिक जीवन में कोई आनन्द नहीं रह गया था। वह अपने व्यवसाय को लेकर मस्त रहता। लाखों का हेर-फेर करने में

कहानी – रानी सारन्धा – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अँधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस

अनायास कृपा बरसने का समय आ गया

जगदम्बा वैसे ही माँ होने के नाते जल्दी पिघल जाती है और ऊपर से नवरात्रि !! नवरात्रि में तो अनायास ही उनकी कृपा बरसती है बस जरुरत है लूटने वाली

कहानी – आभूषण – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

आभूषणों की निंदा करना हमारा उद्देश्य नहीं है। हम असहयोग का उत्पीड़न सह सकते हैं पर ललनाओं के निर्दय घातक वाक्बाणों को नहीं ओढ़ सकते। तो भी इतना अवश्य कहेंगे

कहानी – पंचायत (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

मन्दाकिनी के तट पर रमणीक भवन में स्कन्द और गणेश अपने-अपने वाहनों पर टहल रहे हैं। नारद भगवान् ने अपनी वीणा को कलह-राग में बजाते-बजाते उस कानन को पवित्र किया,

कहानी – त्यागी का प्रेम – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

लाला गोपीनाथ को युवावस्था में ही दर्शन से प्रेम हो गया था। अभी वह इंटरमीडियट क्लास में थे कि मिल और बर्कले के वैज्ञानिक विचार उनको कंठस्थ हो गये थे।

कविताएँ – (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

आह ! वेदना मिली विदाई आह ! वेदना मिली विदाई मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई   छलछल थे संध्या के श्रमकण आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण मेरी यात्रा

कहानी – जुगनू की चमक – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पंजाब के सिंह राजा रणजीतसिंह संसार से चल चुके थे और राज्य के वे प्रतिष्ठित पुरुष जिनके द्वारा उनका उत्तम प्रबंध चल रहा था परस्पर के द्वेष और अनबन के

नाटक – प्रथम अंक – अजातशत्रु (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

प्रथम दृश्य स्थान – प्रकोष्ठ   राजकुमार अजातशत्रु , पद्मावती , समुद्रदत्त और शिकारी लुब्धक।     अजातशत्रु : क्यों रे लुब्धक! आज तू मृग-शावक नहीं लाया। मेरा चित्रक अब