उपन्यास – कर्मभूमि – 5-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘यह क्यों नहीं कहते तुममें गैरत नहीं है?’ ‘आप तो मुसलमान हैं। क्या आपका फर्ज नहीं है कि बादशाह की मदद करें?’   ‘अगर मुसलमान होने का यह मतलब है

उपन्यास – गबन -1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट गई। रमा ने पूछा–क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?   जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा–कुछ नहीं,

उपन्यास – गबन – 2 -2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमेश ने मुस्कराकर कहा, ‘अच्छा, यह किस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये किसलिए दिए! मैं गिन रहा था, छः नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।’ रमानाथ-‘ठग

उपन्यास – गबन – 3 -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

इक्कीस   अगर इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से निराश, चिंताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो, तो उस युवक को देखे, जो साइकिल

उपन्यास – गबन – 4 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उसी दिन शव काशी लाया गया। यहीं उसकी दाह-क्रिया हुई। वकील साहब के एक भतीजे मालवे में रहते थे। उन्हें तार देकर बुला लिया गया। दाह-क्रिया उन्होंने की। रतन को

उपन्यास – गबन – 4 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पैंतीस रूदन में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर, किसी की स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसक-सिसक और बिलखबिलख नहीं रोया, वह जीवन

उपन्यास – गबन – 5 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अड़तालीस सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधाकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई हरियाली । ज़ोहरा गई भी होगी ?

उपन्यास – गोदान – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रांत के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की कोई जरूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल