महन्त भागवतदास ‘कानियाँ’ की नागा-जमात के साथ मैंने पंजाब और नार्थवेस्ट फ्रण्टियर प्राविंस का लीला-भ्रमण किया। अमृतसर, लाहौर, सरगोधा मण्डी, चूहड़ काणा, पिंड दादन खाँ, मिण्टगुमरी, कोहाट और बन्नू तक
‘बाबू!’ जवान लड़के ने वृद्ध, धनिक और पुत्रवत्सल पिता को सम्बोधित किया। ‘बचवा… !’ ‘मिर्ज़ापुर में पुलिस सब-इन्स्पेक्टर की नौकरी मेरा एक दोस्त, जो कि पुलिस में है, मुझे दिलाने
अरसा हुआ वाराणसी के दैनिक अखबार ‘आज’ में आदरणीय पं. श्रीकृष्णदत्तजी पालीवाल की चर्चा करते हुए मैंने लिखा था कि मेरे पाँच गुरु हैं, जिनमें एक पालीवालजी भी हैं। उन
तहसीली मदरसा बराँव के प्रथमाध्यापक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारियों में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियाँ लगा रखी थीं। दरवाजों पर लताएँ चढ़ा दी थीं। इससे