कहानी – नाग पूजा – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

प्रातःकाल था। आषाढ़ का पहला दौंगड़ा निकल गया था। कीट-पतंग चारों तरफ रेंगते दिखायी देते थे। तिलोत्तमा ने वाटिका की ओर देखा तो वृक्ष और पौधे ऐसे निखर गये थे

कहानी – पत्थर की पुकार (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

नवल और विमल दोनों बात करते हुए टहल रहे थे। विमल ने कहा- ”साहित्य-सेवा भी एक व्यसन है।”   ”नहीं मित्र! यह तो विश्व भर की एक मौन सेवा-समिति का

आत्मकथा – प्रवेश – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

चन्‍द ही महीने पहले बिहार के विदित आचार्य श्री शिवपूजन सहायजी (पद्मभूषण), आचार्य नलिन विलोचनजी शर्मा तथा श्री जैनेन्‍द्र कुमारजी मेरे यहाँ कृपया पधारे थे। साथ में बिहार के दो-तीन

कहानी – लोकमत का सम्मान – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बेचू धोबी को अपने गाँव और घर से उतना ही प्रेम था, जितना प्रत्येक मनुष्य को होता है। उसे रूखी-सूखी और आधे पेट खाकर भी अपना गाँव समग्र संसार से

आत्मकथा – अपनी खबर – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

मनकि बेचन पाँडे, वल्‍द बैजनाथ पाँडे, उम्र साठ साल, क़ौम बरहमन, पेशा अख़बार-नवीसी और अफ़साना-नवीसी, साक़िन मुहल्‍ला सद्दूपुर चुनार, ज़िला मिर्ज़ापुर (यू.पी.), हाल मुकाम कृष्‍णनगर, दिल्‍ली-31, आज ज़िन्‍दगी के साठ

आत्मकथा – धरती और धान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘अरे बेचन! न जाने कौन आया था— उर्दजी, उर्दजी, पुकार रहा था!’ ये शब्‍द मेरी दिवंगता जननी, काशी में जन्‍मी जयकली के हैं जिन्‍हें मैं ‘आई’ पुकारा करता था। यू.पी.

कहानी – अनबोला (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

उसके जाल में सीपियाँ उलझ गयी थीं। जग्गैया से उसने कहा-”इसे फैलाती हूँ, तू सुलझा दे।” जग्गैया ने कहा-”मैं क्या तेरा नौकर हूँ?”   कामैया ने तिनककर अपने खेलने का

आत्मकथा – चुनार – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

रामचन्‍द्र भगवानद्य सरयू नदी के किनारे पैदा हुए थे, मैं पैदा हुआ गंगा सुरसरि के किनारे। मुझे सरयू उतनी अच्‍छी नहीं लगतीं जितनी नर, नाग, विबुध बन्‍दनी गंगा। रामचन्‍द्र भगवान्

कहानी – सेवा-मार्ग – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘तारा ने बारह वर्ष दुर्गा की तपस्या की। न पलंग पर सोयी, न केशो को सँवारा और न नेत्रों में सुर्मा लगाया। पृथ्वी पर सोती, गेरुआ वस्त्र पहनती और रूखी

आत्मकथा – नागा भागवतदास – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

यह सन् 1910 ई. है। और यह नगर? इसका नाम है मिण्‍टगुमरी! मिण्‍टगुमरी? यह नगर कहाँ है रे बाबा! यह नगर इस समय पश्चिमी पाकिस्‍तान में है, लेकिन जब की

कहानी – ज्योतिष्मती (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

तामसी रजनी के हृदय में नक्षत्र जगमगा रहे थे। शीतल पवन की चादर उन्हें ढँक लेना चाहती थी, परन्तु वे निविड़ अन्धकार को भेदकर निकल आये थे, फिर यह झीना

आत्मकथा – राममनोहरदास – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

महन्‍त भागवतदास ‘कानियाँ’ की नागा-जमात के साथ मैंने पंजाब और नार्थवेस्‍ट फ्रण्टियर प्राविंस का लीला-भ्रमण किया। अमृतसर, लाहौर, सरगोधा मण्‍डी, चूहड़ काणा, पिंड दादन खाँ, मिण्‍टगुमरी, कोहाट और बन्‍नू तक

आत्मकथा – भानुप्रताप तिवारी – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

बचपन में मेरे मुहल्‍ले में दो हस्तियाँ ऐसी थीं जिनका कमोबेश प्रभाव मुझ पर सारे जीवन रहा। उनमें एक थे भानुप्रताप तिवारी (जब मैं सात बरस का था, वह साठ

कहानी – धर्मसंकट – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पुरुषों और स्त्रियों में बड़ा अन्तर है, तुम लोगों का हृदय शीशे की तरह कठोर होता है और हमारा हृदय नरम, वह विरह की आँच नहीं सह सकता।’ ‘शीशा ठेस

आत्मकथा – बच्चा महाराज – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘बाबू!’ जवान लड़के ने वृद्ध, धनिक और पुत्रवत्‍सल पिता को सम्‍बोधित किया। ‘बचवा… !’ ‘मिर्ज़ापुर में पुलिस सब-इन्‍स्‍पेक्‍टर की नौकरी मेरा एक दोस्‍त, जो कि पुलिस में है, मुझे दिलाने

कहानी – सहयोग (लेखक – जयशंकर प्रसाद)

मनोरमा, एक भूल से सचेत होकर जब तक उसे सुधारने में लगती है, तब तक उसकी दूसरी भूल उसे अपनी मनुष्यता पर ही सन्देह दिलाने लगती है। प्रतिदिन प्रतिक्षण भूल