ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड, नार्वे, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि द्वारा संचालित पर्यावरणीय उपक्रम की वेबसाइट पर प्रकाशित 3 प्रयास

आप सभी आदरणीय पाठकों को प्रणाम,

संयुक्त राष्ट्र संघ की इन 3 संस्थाओं- फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (FAO), यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP), यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) और ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड, नार्वे आदि जैसे देशों की सरकारों के सहयोग से …………………… “यू एन रेड्ड प्रोग्राम” (UN-REDD Programme) नाम का एक विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणीय उपक्रम संचालित होता है …………………… (संयुक्त राष्ट्र की FAO और UNEP से “स्वयं बनें गोपाल” का संबंध जानने के लिए कृपया हमारे इस आर्टिकल को पढ़ें- संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरणीय उपक्रम “ग्लोबल वेस्ट वॉटर इनिशिएटिव” का मेंबर बना “स्वयं बनें गोपाल” समूह) !

यह “यू एन रेड्ड प्रोग्राम” पर्यावरण के प्रति, समाज का कौशल निर्माण (Capacity Development) करता है अपनी “रेड्ड प्लस एकडेमी” (REDD+ Academy) के माध्यम से …………………. इस “रेड्ड प्लस एकडेमी” में REDD का मतलब होता है- Reducing Emissions from Deforestation and Forest Degradation – अर्थात, वनों की कटाई और क्षरण से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Gas Emissions) को कम करना …………………. जिसमें वन सरंक्षण (Forest Conservation), सतत वन प्रबंधन (Sustainable Forest Management) और वन कार्बन भंडार (Forest Carbon Stocks) बढ़ाने जैसे पहलू भी शामिल हैं …………………. (ग्रीनहाउस गैसेस और वन सुरक्षा से संबंधित, हमारे पूर्व प्रकाशित आर्टिकल को पढ़ने के लिए, कृपया इन 2 लिंक्स पर क्लिक करें- जानिये हार्वर्ड, ऑक्सफ़ोर्ड, “स्वयं बनें गोपाल” समूह आदि के सहयोग द्वारा निर्मित संयुक्त राष्ट्र संघ की “नेट जीरो एमिशन्स कमिटमेंट्स” रिपोर्ट के बारे में ………………….. और …………………… पूरे विश्व के सिर्फ 20 ऐसे पर्यावरणीय कार्यक्रम, जो इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ की वेबसाइट पर प्रकाशित हुए) !

इस “रेड्ड प्लस एकडेमी” का उद्देश्य है- सरकारों, पर्यावरण समूहों व विशेषज्ञों को जंगल, जलवायु परिवर्तन, कार्बन मार्केट्स जैसे समाजोपयोगी विषयों में कौशल निर्माण करना यानी ज्ञान एवं व्यावहारिक क्षमता प्रदान करना है, जिसके बारें में अधिक जानने के लिए कृपया इसकी वेबसाइट देखें और यह यूट्यूब वीडियो भी देखें- https://reddacademy.in.howspace.com/welcome ………………….. और …………………… From concept to reality: UN-REDD Programme’s REDD+ Academy explained in new video !


वर्तमान में “रेड्ड प्लस एकडेमी” की मुख्यतः तीन प्रकार की गतिविधियाँ हैं, जो कि निम्नलिखित हैं-

लर्निंग जर्नल्स (Learning Journals)- यह विश्वस्तरीय और प्रामाणिक ज्ञानकोष है ! इसका मकसद, पार्टनर देशों को नॉलेज मैनेजमेंट व ज़मीनी स्तर पर REDD+ को लागू करने में मदद करनेके लिए, व्यवस्थित और केंद्रित क्षमता को विकसित करना है !

कम्युनिटीज़ ऑफ़ प्रैक्टिस (Communities of Practice)- इस वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म पर अलग-अलग देशों, डोनर्स, और स्टेकहोल्डर्स के बीच बहुउपयोगी जानकारियों का आदान प्रदान व नेटवर्किंग (Knowledge Exchange & Networking) होता है, ऑनलाइन फ़ोरम, वेबिनार और वर्चुअल मीटिंग के माध्यम से !

लर्निंग लैब्स (Learning Labs) – ये लैब्स (प्रैक्टिकल वर्कशॉप्स, नॉलेज शेयरिंग सेशन आदि) सामाजिक समावेश, नतीजों पर आधारित फाइनेंस और फॉरेस्ट कार्बन मार्केट जैसे क्षेत्रों की चुनौतियों का समाधान करती हैं ! ये देशों की सरकारों को अपने अनुभव साझा करने और प्रभावी क्लाइमेट एक्शन के लिए रणनीतियां बनाने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं !

इसी “लर्निंग लैब्स” के “एशिया पैसिफिक लर्निंग लैब ऑन फॉरेस्ट कार्बन मार्केट्स” सेक्शन में …………………. “स्वयं बनें गोपाल” समूह के साथ – साथ 2 और ग्रुप एक्टिविटी भी प्रकाशित हैं ……………….. जिन्हे देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- https://reddacademy.in.howspace.com/asia-pacific-learning-lab-on-forest-carbon-markets …………………. या उन तीनों का नाम यहाँ देखा जा सकता है- (1) IC-VCM CCPs (2) Caractéristiques du marché des médicaments et stratégies des firmes pharmaceutiques (3) Svyam Bane Gopal Group Exercise Forest Carbon Markets.

चूंकि “रेड्ड प्लस एकडेमी” वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी जानकारी को देखने के लिए इसकी कम्युनिटी में रजिस्ट्रेशन आवश्यक है इसलिए आदरणीय पाठकों की सुविधा के लिए “स्वयं बनें गोपाल” समूह की उस ग्रुप एक्टिविटी का लिंक, यहाँ अलग से भी प्रस्तुत है, जिस पर क्लिक करके उसे देखा जा सकता है- Svyam Bane Gopal Group Exercise Forest Carbon Markets

“यू एन रेड्ड प्रोग्राम” से जिन देशों की सरकारें पार्टनर की तरह जुड़ी हुई हैं उनका नाम देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- https://www.un-redd.org/our-work/partners-countries …………………. या उनके नाम निम्नलिखित लिस्ट में भी देखा जा सकता है-

• Government of India
• Government of Malaysia
• Government of Thailand
• Government of Argentina
• Government of Chile
• Government of Indonesia
• Government of Panama
• Government of Ethiopia
• Government of Fiji
• Government of Benin
• Government of Bolivia
• Government of Burkina Faso
• Government of Cambodia
• Government of Cameroon
• Government of Central African Republic (the)
• Government of Chad
• Government of Congo (Republic of the)
• Government of Costa Rica
• Government of Côte d’Ivoire
• Government of Democratic Republic of the Congo (the)
• Government of Dominican Republic
• Government of Ecuador
• Government of El Salvador
• Government of Equatorial Guinea
• Government of Gabon
• Government of Ghana
• Government of Guatemala
• Government of Guinea Bissau
• Government of Bangladesh
• Government of Guinea (Republic of)
• Government of Guyana
• Government of Honduras
• Government of Jamaica
• Government of Bhutan
• Government of Kenya
• Government of Lao Peoples’ Democratic Republic (the)
• Government of Liberia
• Government of Madagascar
• Government of Malawi
• Government of Mongolia
• Government of Morocco
• Government of Mozambique
• Government of Nepal
• Government of Nigeria
• Government of Papua New Guinea
• Government of Paraguay
• Government of Peru
• Government of Philippines
• Government of Samoa
• Government of Solomon Islands
• Government of Sri Lanka
• Government of Suriname
• Government of Tanzania
• Government of The Gambia
• Government of Togo
• Government of Tunisia
• Government of Uganda
• Government of Vanuatu
• Government of Viet Nam
• Government of Zambia
• Government of Zimbabwe

तो इस तरह देखा जा सकता हैं कि ना केवल संयुक्त राष्ट्र संघ बल्कि लगभग सभी देशों की सरकारें भी सबसे ज्यादा चिन्तित हैं पर्यावरण सरंक्षण के लिए, क्योकि अगर पर्यावरण बर्बाद हुआ तो ना सिर्फ खाने के लाले पड़ जाएंगे बल्कि पानी की हर एक बूँद के लिए भी तरसना पड़ सकता है, इसलिए आजकल दुनिया के लगभग सभी अल्ट्रा रिच पीपल (अरबपति लोग) बड़े पैमाने पर खेती लायक जमीन खरीद रहें हैं क्योकि उन्हें पता है कि वर्तमान के जो युद्ध व अनिश्चितता वाले हालात हैं उसमें कभी भी ऐसा हो सकता है कि तिजोरी में पैसा भरे होने के बावजूद अन्न/जल की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है !

इससे यह भी साबित होता है कि जहां आज भी ज्यादातर मध्यम वर्गीय लोग सिर्फ टेक्नोलॉजी (जैसे- AI, ए आई) को सबसे ज्यादा कमाई व सम्मान पाने का जरिया मानते हैं, वहीं अपनी दूरदर्शी सोच की वजह से अरबपति हुए लोग टेक्नोलॉजी के साथ – साथ सबसे बुनियादी जरूरत यानी खेती से भी खूब प्रॉफिट कमाने की तैयारी कर रहें हैं (अधिक जानकारी के लिए, कृपया यह वीडियो देखें- Bill Gates इतनी जमीन क्यों खरीद रहे हैं? Billionaire Land Strategy Explained) !

इतना ही नहीं, ये अरबपति लोग जो फसल खुद खातें हैं उसे सिर्फ आर्गेनिक (प्राकृतिक) तरीके से उगाते हैं, जबकि भारत जैसा परम सौभाग्यशाली देश जहाँ भारतीय देशी नस्ल की गाय माँ का अमृत स्वरुप गोबर आसानी से मिल सकता हैं, वहाँ के अधिकाँश किसान आज भी गरीबी में जी रहें हैं क्योकि उन्हें अविश्वास और शर्म, दोनों महसूस होता हैं गोबर से खेती करने में, इसलिए ये किसान वर्षों से केमिकल्स युक्त फ़र्टिलाइजर्स व पेस्टिसाइड्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते आ रहें हैं जिनसे उनके खेत की उपजाऊ क्षमता व फसल की पोषक क्षमता दोनों दिन ब दिन बर्बाद होती जा रहीं हैं !

बिना किसी भी अन्य चीज की मदद लिए हुए, केवल एकमात्र देशी गाय माँ गोबर की मदद से, हर तरह की फसलों की बम्पर पैदावार उगाना इतना आसान है कि …………………. आपको जीवामृत खाद (जिसके बारें में जानने के लिए हमारे इस आर्टिकल को पढ़ें- विश्व पर्यावरण दिवस पर, जानिये स्वयं व समाज को भी जबरदस्त लाभान्वित कर सकने वाली आसान थ्योरी “चार बिना हार” को) जैसी आसान खाद भी बनाने की जरूरत नहीं है …………………. इसके लिए आपको बस इतना करना है कि आपकी गाय माँ रोज जितना ताजा गोबर दें, उसे रोज अपने खेत में ले जाकर, मेड़ या किसी भी खाली पड़ी जगह में छोटा सा गड्ढा खोदकर, उसमें गोबर डालकर मिटटी या पत्तियों से ढक दें …………………. लेकिन इतना ख्याल रखें कि ताज़ा गोबर को किसी पेड़ – पौधे के जड़ से एकदम सटाकर ना डालें ………………… क्योकि ताज़ा गोबर अपघटित होकर खाद बनने की प्रक्रिया के दौरान बहुत गर्म (लगभग 60°C से 70°C तक) हो जाता है, जिससे पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है इसलिए ताजे गोबर को जड़ से थोड़ी दूरी पर दबाना चाहिए …………………. लेकिन अगर पहले से ही पूरे खेत में हर तरफ फसलें लगी हुई हो जिसकी वजह से कोई ऐसी खाली जगह उपलब्ध ना हो जहाँ ताजे गोबर को जमीन में दबाया जा सके …………………. तो ताजे गोबर को, 100 गुना पानी में अच्छे से घोलकर भी, तुरंत सीधे हर तरह के फसलों/पौधों की जड़ों में डाला जा सकता है, जिससे फसलों/पौधों को बहुत लाभ मिलता है !

देखा जाए तो प्राचीन काल में यही तो होता था, जब लोग (जैसे भगवान् कृष्ण भी) रोज अपनी गायों को चराने वन (जैसे वृन्दावन) में जाते थे तो उनकी गायें जंगल में चरते समय खूब गोबर करती थी, और वो गोबर कुछ ही दिनों में पेड़ से गिरी पत्तियों से अपने आप ढक जाता था और फिर उसके कुछ दिनों बाद वो गोबर अपघटित होकर अपने आप बेशकीमती खाद में बदल जाता था, जिसकी वजह से जंगल की जमीन घनघोर उपजाऊ बनी रहती थी और जंगल के सभी पेड़ पौधे भी बहुत स्वस्थ बने रहते थे जिनमें कभी भी कोई कीटनाशक डालने की जरूरत नहीं पड़ती थी (गाय माँ के स्वच्छंद चरने की जगह यानी गोचर भूमि की पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में आश्चर्यजनक महिमा जानने के लिए कृपया हमारा यह आर्टिकल पढ़ें- संयुक्त राष्ट्र संघ की वेबसाइट में प्रकाशित, वे 9 भारतीय कार्यक्रम जो पर्यावरण सरंक्षण में पशुपालन महात्म्य की जागरूकता बढ़ाते हैं) !

वैसे आज भी जंगली पेड़ – पौधे, शहरी पेड़ – पौधों की तुलना में बहुत ही ज्यादा स्वस्थ – मजबूत होतें हैं, लेकिन आजकल जगंल के पेड़ – पौधों में भी रोग लगना शुरू हो गए हैं (जिनके बारें में अधिक जानने के लिए कृपया ये न्यूज़ पढ़ें- Common Forest Disease Problems ………………… और ………………… Tree Diseases: How To Identify Them And Protect Forest) और इस रोग लगने का कारण, कई बुद्धिजीवी लोग, जगलों में इंसानों की अनुचित दखलअंदाजी, और गाय माँ के गोबर का अभाव बताते हैं !

सही बात है जब से लोगों ने कुत्तों (जो कि धर्म के अनुसार, मांसाहारी नस्ल होने की वजह से घर के अंदर रखना अपवित्र माना जाता है) को रखना अपना हाई स्टेटस सिंबल मान लिया ………………… और गाय माँ (जो कि धर्म के अनुसार, प्रेमपूर्वक रखे जाने पर सभी वास्तुदोष और ग्रह दोष समाप्त कर सकती हैं) को रखना देहाती या गंवारपन का निशानी मान लिया ………………… तब से समाज में काफी कुछ उल्टा पुल्टा हो गया है !

देखिये वैसे भी समय बहुत खराब चल रहा है और “भविष्यमालिका” जैसे ग्रंथ (जिसके बारे में अधिक जानने के लिए कृपया हमारा यह आर्टिकल पढ़ें- क्या “भविष्यमालिका” ग्रंथ में वर्णित आश्चर्यजनक भविष्यवाणियां सच हो सकती हैं ?) से सुनने में आयी जानकारियों के अनुसार, वर्तमान से लेकर वर्ष 2032 तक का समय विशेष कष्टकारी हैं जिसमें क्या राजा, क्या रंक सभी भीषण तकलीफों का सामना कर सकतें हैं और यह तकलीफें व्यक्तिगत जीवन (जैसे बीमारी, एक्सीडेंट, आर्थिक तंगी, झगड़ा, अपमान, अपनों का विछोह आदि) से लेकर सामूहिक जीवन (जैसे बाढ़, भूकंप, युद्ध, महंगाई आदि) तक की हो सकती हैं !

अतः ऐसे कठिन समय में सबसे शक्तिशाली सुरक्षा कवच का काम कर सकता है गाय माँ का बेशकीमती आशीर्वाद, जो की मिलता है उन्हें ससम्मान भोजन, इलाज, आरामदायक आश्रय आदि जैसी सेवायें देने से ! अगर किसी कारण से गाय माँ की प्रत्यक्ष रूप से सेवा कर पाना सम्भव ना हो सके तो मात्र उनकी ममतामयी तस्वीर को ही सम्मान देने से जीवन में आश्चर्यजनक तरक्की प्राप्त हो सकती है, जिसके बारे में अधिक जानने के लिए कृपया हमारे इस आर्टिकल को पढ़ें- सभी वास्तुदोषों को बेहद जल्दी समाप्त करके, घर को ही महाशुभदायक तीर्थ बनाने का एक सबसे आसान तरीका !

अंततः सारांश रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय देशी नस्ल की गाय माँ ना केवल स्वस्थ पर्यावरण, बल्कि सुरक्षित जीवन की भी आधारशिला है (गाय माँ के सैकड़ों आश्चर्यजनक लाभ जानने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- जानिये ➤ बेहद उपजाऊ खेती – सुंदर स्वास्थ्य – महापुण्य के साथ सारी मनोकामनायें, कैसे पूरी कर सकतीं हैं श्री कृष्ण माता अर्थात भारतीय देशी नस्ल की गाय माँ) !

जय हो परम आदरणीय गौ माता की !
वन्दे मातरम् !

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